जादुई चक्की | Jadui Chakki | Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories

जादुई चक्की | Jadui Chakki | Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories


कहानियां हमारी जीवन में एक दर्पण का कार्य करती है। यह हमेशा किसी पाठक के लिए आनंदित माहौल पैदा करने के साथ-साथ, उसे कुछ नया भी सिखाती हैं। अगर आप Hindi Stories, Moral Stories या Bedtime Stories पढ़ने के शौकीन हैं तो आज मैं आपके साथ एक नई कहानी साझा करने जा रहा हूं। इस कहानी का नाम है - जादुई चक्की। यह एक Jadui Kahani है, तो कहानी में हमारे साथ अंत तक जुड़े रहें।

जादुई चक्की | Jadui Chakki | Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories

Jadui Chakki| Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories


 जादुई चक्की 


उदयपुर गांव में एक बहुत ही लालची व्यक्ति बाबूलाल रहा करता है। वो बहुत ही ज्यादा लालची था। उसे बस किसी भी तरह धन चाहिए था। एक दिन गांव के कुछ लोग आपस में बात कर रहे होते हैं

पहला आदमी," सुना है... अपने गांव में चमत्कारी बाबा आये हुए सुना है, वो बहुत बड़े ज्ञानी हैं। उनसे जो भी मांगो वो अवश्य ही दे देते है, हाँ। "

दूसरा आदमी," क्या बोल रहे हो भाई ? क्या सच में हमारे गांव में चमत्कारी बाबा आये हुए है ? अगर ऐसा है तो मैं अवश्य ही उनके पास जाऊंगा, हाँ। "

पहला आदमी,"हाँ हाँ भाई, सुना तो ऐसा ही है। चलो कल सुबह चलकर देखेंगे। मुझे तो काफी कुछ मांगना है चमत्कारी बाबा से, हाँ। "

उन दोनों की ये बातें बाबूलाल सुन रहा होता है।

बाबूलाल," क्या सचमुच चमत्कारी बाबा हमारे गांव में आये हैं ? अगर ऐसा है तो मैं जरूर जाऊंगा और वो भी इन लोगों से पहले। मेरी तो वैसे भी बहुत सारी इच्छाएं हैं, हाँ। "

थोड़ी देर बाद वो गांव के जंगल में उस चमत्कारी बाबा के पास जाता है। चमत्कारी बाबा एक पेड़ के नीचे बैठे ओउम का उच्चारण कर रहे थे।

बाबा," ओऊम... ओउम। "

तभी बाबूलाल उनके पास जाता है।

बाबा," प्रणाम बाबा ! मैं इस गांव का निवासी हूँ। मैंने बहुत सुना है आपके बारे में। मैं भी आपसे कुछ मांगने आया हूँ। अब मुझे यकीन है कि आप अपनी शक्ति से मेरी इच्छा अवश्य पूरी करेंगे। "

बाबा," हरि ओउम... क्यों नहीं बेटा ? हमने सौ वर्षों के तप के बाद जो शक्तियां पायी है, हम उनकी सहायता से तुम्हारी सहायता अवश्य करेंगे। बताओ, तुम्हें क्या चाहिए ? "

बाबूलाल," बाबा, मैं तो बस आपकी सेवा भाव से आया हूँ। "

बाबूलाल (मन में)," लगता है ये बेहतर काम करेगा, हाँ। "

बाबूलाल,"आप मेरे घर चलें। मैं आप की आवभगत करना चाहता हूँ। इसके अलावा मेरे मन में कोई लालसा नहीं है। आशा करता हूँ, आप मना नहीं करेंगे। "

बाबा," आज के इस वक्त में तुम्हारे जैसा इंसान जो बिना किसी लोभ मुझे आमंत्रित कर रहा हो, मैं अवश्य चलूँगा। "

जिसके बाद चमत्कारी बाबा बाबूलाल के साथ उसके घर जाते हैं।

बाबूलाल," अरे भाग्यवान ! देखो हमारे घर चमत्कारी बाबा आये हैं। तुम जल्दी से इनके भोजन की व्यवस्था करो। "

जानकी," क्या सच में..? मैंने बाबा के बारे में गांव वालों से बहुत सुना है, हाँ। आप सभी की इच्छा पूरी करते हैं, बाबा ? "

जानकी," हम तो धन्य हो गयी, जी। मैं अभी बाबा के लिए भोजन लेकर आती हूँ, हाँ। "

जिसके बाद चमत्कारी बाबा के सामने भोजन की थालियां सज जाती है और बाबा पेट भरकर भोजन करते हैं।

बाबा," अरे वाह ! वाह बेटा... इतना स्वादिष्ट भोजन खाकर तो मेरी आत्मा ही संतुष्ट हो गयी। वाह ! मैं बहुत खुश हूँ। अब बोल बच्चा। "

बाबूलाल (मन में)," अरे बाबा ! जल्दी से कुछ मांगने को कहो ना, मेरी सांसे सूख रही है। इतना तो हम किसी को नहीं खिलाते जितना तू एक बार में ठूंस गया। "

बाबूलाल," अरे बाबा ! ये तो हमारा सौभाग्य है कि आप हमारे अतिथि बनकर पधारे हैं। "

बाबा," वत्स ! मैं तुम्हें कुछ देना चाहता हूँ। "

बाबूलाल," अरे ! बाबा की जय हो, जय हो बाबा की। आप इतनी श्रद्धा से बोल रहे हो तो हमें बहुत सारा धन चाहिए, बाबा। 

बहुत सारा... इतना कि मुझे जीवन में धन की कभी कोई कमी ही महसूस ना हो, हाँ। "

बाबा," बेटा, तुम्हारी इच्छा अवश्य ही पूरी होगी। "

तभी बाबा उसे चार मिट्टी के दिये देते हैं।

बाबा," बेटा, ये चार मिट्टी के दिये है जो तुम्हें धन की ओर ले जाएंगे। जब भी तुम्हें धन की आवश्यकता हो तो पहला दिया जला लेना। 

दिए के जलते ही तुम्हें एक दिशा दिखाई देगी जिसपर चलकर तुम्हें धन की प्राप्ति होगी। अगर तुम्हें दोबारा धन की आवश्यकता होगी तो दूसरा मिट्टी का दिया जला लेना जिसपर चलकर तुम्हें फिर से धन की प्राप्ति होगी। 

अगर फिर भी तुम्हें धन की कमी महसूस हो तो मिट्टी का तीसरा दिया जला लेना जहाँ से तुम्हें अपार धन मिल जाएगा। 

लेकिन भूलकर भी चौथा दिया ना तो चलाना है और ना उस दिशा की ओर जाना है। अगर तुमने ऐसा किया तो तुम अपना सर्वनाश कर बैठोगे। "

बाबूलाल," ठीक हैं बाबा, मैं चौथा दिया नहीं जाऊंगा, हाँ। "

बाबा," अच्छा ठीक है बेटा, अब मैं चलता हूँ। "

इसके बाद वो बाबा वहाँ से चला जाता है।

बाबूलाल," ये देखो भाग्यवान, अब मैं धन की तलाश में जा रहा हूँ और खूब सारा धन लेकर ही लौटूंगा, हाँ। 

फिर देखना हम इस गांव में सबसे अमीर हो जाएंगे। इतना धन होगा कि जीवन भर आराम से जीवन बिताएंगे, हाँ। "

जानकी," नहीं नहीं, मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है, जी। आप मत जाईये। हमारे पास जितना है उतना ही काफी है, जी। आखिर इतने धन का हम क्या करेंगे ? "

बाबूलाल," अरे भाग्यवान ! तुम मूर्ख हो, मूर्ख... आखिर धन से बढ़कर भी कोई और वस्तु है क्या इस संसार में ? अरे ! तुम चुप करो, मैं जा रहा हूँ और अब तो धनवान होकर ही वापस लौटूंगा। "

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बाबूलाल ( गाना गाते हुए)," दुख भरे दिन गए रे भैया, अब तो सुख आयो रे। जय हो बाबा की, जय हो। "

बाबूलाल," कितना दिमाग है मुझमें ? कैसे चिकनी चुपड़ी बातें करके बाबा से धनवान होने की युक्ति पाली मैंने। वाह रे बाबूलाल ! बड़ा बुद्धिमान है रे तू। "

बाबूलाल वहाँ से एक जंगल की ओर चला जाता है और बाबा का दिया हुआ पहला दिया जला देता है। पहला दिया जलाते ही उसे एक रास्ता दिखाई देता है।

बाबूलाल," अरे वाह ! ये रहा वो रास्ता जो बाबा ने बताया था। "

वो उस रास्ते पर चलने लगता है। थोड़ी दूरी पर चलते ही उसे एक बूढ़ी अम्मा दिखाई पड़ती है जो बहुत ही ज्यादा रो रही होती है।

बाबूलाल," अरे ! क्या बात है अम्मा, रो क्यों रही हो और मेरा धन कहाँ है ? इस बढ़िया से बात करके देखता हूँ। "

बाबूलाल," अरे अम्मा ! इस जंगल में तुम अकेली... और रो क्यों रही हो ? "

बुढ़िया," अरे बेटा ! मेरी उम्र पूरी हो चुकी है। अब मैं मरने वाली हूँ। लेकिन मेरा इस दुनिया में कोई भी नहीं है इसलिए मैं रो रही हूँ। 

आखिर मरने के बाद कौन मुझे अग्नि देगा, बेटा ? मेरे पास मेरा जोड़ा हुआ कुछ धन है लेकिन मैं उसे ही अपना धन दूंगी जो मेरे मरने के बाद मुझे अग्नि देगा। "

बाबूलाल ये सुनते ही लालच में आ जाता है।

बाबूलाल," क्या सच में तुम्हारा कोई नहीं है अम्मा ? अच्छा कोई नहीं... मैं तुम्हें तुम्हारे मरने के बाद अवश्य ही अग्नि दूंगा, हाँ हाँ। तुम मुझे ही अपना धन दे देना। "

बुढ़िया," ठीक है। यहाँ से कुछ ही दूरी पर मेरी एक झोपड़ी है। उसमें एक पोटली में मेरा धन रखा हुआ है। मेरे मरने के बाद तुम वो धन ले लेना और मेरे शरीर को मुख अग्नि देना। "

ऐसा बोलते ही बूढ़ी अम्मा के प्राण निकल जाते हैं। तभी बाबूलाल पास के जंगल में जाकर कुछ लकड़ियां लेकर आता है और उस बूढ़ी अम्मा को अग्नि देता है। 

जिसके बाद वो उसकी झोपड़ी में जाता है और उसे वहां धन से भरी पोटली मिलती है। उसे देखते ही बाबूलाल खुश हो जाता है।

बाबूलाल," अरे वाह वाह ! इसमें तो सच में धन है। लेकिन ये क्या..? ये तो बहुत ही कम है। इसमें भला मेरा क्या होगा ? 

खैर अब इसे भी रख ही लेता हूँ, हाँ। धन कितना भी क्यों ना हो, छोड़ना अच्छा नहीं है, हाँ ? "

जिसके बाद वो वहाँ से थोड़ा आगे बढ़ता है।

बाबूलाल," इतने कम धन से मेरा क्या होगा ? अरे ! हाँ, मुझे दूसरा दिया जलाना चाहिए। "

अब बाबूलाल दूसरा दिया जलता है। दूसरे दिये के जलते ही उसे फिर से रास्ता दिखता है। बाबूलाल उस रास्ते की ओर चलने लगता है। 

आगे बढ़ते ही उसे एक जगह दिखती है जो बहुत ही सुंदर होती है। वहाँ पर बहुत सी रौशनी होती है। जमीन के एक टुकड़े के ऊपर बहुत सारी तितलियां उड़ती दिखाई देती है।

बाबूलाल," अरे ! लगता है... ये तितलियां मुझे संदेश दे रही है। इस जमीन के नीचे ही धन है, हाँ। "

तभी वो जमीन खोदने लगता है और जमीन के अंदर से अचानक से रोशनी निकलती है। वो देखता है की एक बहुत ही सुंदर चमकता हुआ हार वहाँ है। ये देखकर तो बाबूलाल की आंखें चार हो जाती है।

बाबूलाल," अरे वाह ! इतना सुन्दर सोने का हार। हाय हाय ! ये तो सच में बहुत सुंदर है। इसे मैं अपनी पत्नी को दूंगा, हाँ। 

गांव में इतना सुन्दर हार तो किसी की भी पत्नी के पास नहीं होगा। अरे वाह वाह... लेकिन भला इस एक हार से मेरा क्या होगा ? नहीं नहीं, मुझे तो अपार धन चाहिए, हाँ। "

बाबूलाल फिर से आगे बढ़ता है और तीसरा दिया जलाता है। तीसरा दिया जलते ही उसे फिर से रास्ता दिखता है और वो उस रास्ते पर चलने लगता है। 

तभी वो देखता है कि चारों तरफ कुछ भी नहीं है, सिवाय एक विशाल पेड़ के। वो उस पेड़ के पास जाता है।

बाबूलाल," अरे ! ना जाने कहाँ होगा अपार धन ? मुझे तो कुछ दिखाई नहीं दे रहा है और अब तो मैं थक गया हूँ। "

जिसके बाद वो उस विशाल पेड़ के नीचे बैठ जाता है। थोड़ी देर बाद उसके ऊपर एक पत्ता गिरता है। जैसे ही वो ऊपर देखता है, उसे एक घड़ा जो बहुत चमक रहा होता है, पेड़ की टहनी पर लटका दिखाई देता है। बाबूलाल यह देखकर हैरान हो जाता है।

बाबूलाल," ये मिट्टी का घड़ा इतना चमक क्यों रहा है ? "

तभी वो पेड़ के ऊपर चढ़ जाता है और वो घड़ा उस टहनी से उतार लेता है। जैसे ही वह घड़े को देखता है, उसकी आंखें खुली रह जाती है। उस घड़े में खूब सारे सोने चांदी के सिक्के होते है।

बाबूलाल," अरे वाह वाह ! इतना सारा सोना चांदी। ये तो बहुत सारा धन है, हाँ। अब लगता है कि मेरे हाथ कुछ धन आया है, हाँ लेकिन ये नहीं, ये भी मेरे लिए अपार धन नहीं है। 

लगता है चमत्कारी बाबा ने मुझे चौथा रास्ता इसलिए नहीं बताया क्योंकि वो खुद ही उस अपार धन को प्राप्त करना चाहता होगा। 

लेकिन नहीं, मैं ऐसा नहीं होने दूंगा, हाँ। वो अपार धन तो मेरा ही होगा, हाँ। मैं चौथे दिये को जलाकर उस चौथे रास्ते पर अवश्य ही जाऊंगा, हाँ। "

तभी वो चौथा दिया जलाता है और चौथे रास्ते की तरफ चलने लगता है। थोड़ी दूर चलते ही वो देखता है कि वो एक बहुत ही सुन्दर महल के पास पहुँच गया है जो बहुत ही आलीशान है।

बाबूलाल," अरे वाह ! इतना सुन्दर महल। ये कितना सुंदर है ? लगता है अपार धन मुझे यही मिलेगा ? "

बाबूलाल इस महल के अंदर जाता है। वो देखता है कि एक बहुत ही बूढ़ा व्यक्ति चक्की चला रहा होता है और उसके आस पास अपार धन पड़ा है। इतना धन देखकर वो खुश हो जाता है।

बाबूलाल," वाह वाह वाह... इतना धन, इतना धन तो मेरे लिए अपार होगा। लगता है ये मेरे लिए है, हाँ हाँ। "

बूढ़ा व्यक्ति," आओ आओ बेटा, मैं जानता हूँ तुम यहाँ इस अपार धन की तलाश में आए हो। ये सारा धन तुम्हारा ही है। लेकिन तुम्हें और धन भी मिल सकता है। क्या तुम और धन चाहते हो ? "

बाबूलाल," क्या कहा और धन ? क्या सच में मुझे इससे भी अधिक धन मिल सकता है ? मुझे तो बहुत सारा अपार धन चाहिए, हाँ हाँ। मैं इस संसार में सबसे अधिक धनी होना चाहता हूँ, हाँ हाँ। "

बूढ़ा व्यक्ति," अच्छा तो ठीक है। अगर तुम और भी ज्यादा धन पाना चाहते हो तो उसमें तुम्हारी मदद ये चक्की ही करेगी, हाँ। ये जादुई चक्की है। तुम जितना इसे चलाओगे उतना ही धन तुम्हारे पास आता जायेगा। "

ये सुनकर बाबूलाल खुश हो जाता है और चक्की जो वो बूढ़ा आदमी चला रहा होता है, उसे चलाने लगता है। 

ऐसे देखते ही देखते वहाँ अपार धन का ढेर लग जाता है और बाबूलाल चक्की चलाते चलाते थक जाता है। 

थोड़ी देर बाद...
बाबूलाल," अब बस... अब और नहीं। अब और ये चक्की नहीं चला सकता मैं, मुझे इतना ही धन पर्याप्त है। "

लेकिन जैसे ही वह चक्की को छोड़ना चाहता है, चक्की उसे नहीं छोड़ने देती। वो चाहकर भी अपने हाथों को चक्की से हटा नहीं पा रहा था।

बाबूलाल," अरे ! ये क्या हो रहा है मेरे साथ ? आखिर मेरे हाथ क्यों इस जादुई चक्की को नहीं छोड़ पा रहे है ? "

बूढ़ा व्यक्ति," बेटा, ये सब तुम्हारे ही अपार धन के लालच की देन है। मैंने भी तुम्हारी ही तरह उस चमत्कारी बाबा का चौथा दिया जलाया था और यहाँ और अधिक धन के लालच में आ गया था। 

बाबा के मना करने के बाद भी जो यहाँ आता है वो यहाँ से नहीं जा पाता है। वो सदैव के लिए इसी अपार धन के बीच रह जाता है। "

बाबुलाल ये सुनकर हैरान हो जाता है।


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बाबूलाल," ये आप क्या बोल रहे है ? नहीं नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। "

बूढ़ा व्यक्ति," ये सच है बेटा, अब तुम यहाँ से तभी जा सकते हो जब कोई तुम्हारी तरह ही लालची इंसान अपार धन पाने के लालच में यहाँ इस महल में आ जाए और अगर कोई नहीं आया तो तुम्हे यही इस चक्की को चलाते रहना होगा। "

ये सुनकर बाबूलाल ज़ोर ज़ोर से रोने लगता है।

बाबूलाल (रोते हुए)," हाय हाय ! ये मैंने क्या कर दिया ? अपार धन पाने की चाह में अपना सर्वनाश कर बैठा। मुझे अधिक लालच नहीं करना चाहिए था, हाय हाय। "


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चमत्कारी अंगूठी | Chamatkari Angoothi | Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories

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 चमत्कारी अंगूठी 


एक गांव में निर्मला नाम की एक औरत रहती थी। निर्मला की एक बेटी थी जिसका नाम काजल था और उसके पति के गुजर जाने के बाद घर की सारी जिम्मेदारी उसके सर आ गयी थी। वो दूसरों के घर में काम करके अपनी बेटी का पेट पालती थी। 

एक दिन काजल अपने स्कूल से आ रही होती है।

निर्मला," क्या हुआ बेटी..? तू इतनी जल्दी स्कूल से कैसे आ गई ? तेरी तबियत तो ठीक है ना ? "

काजल," माँ मुझे स्कूल से निकाल दिया है। आपने तीन महीनों से मेरी स्कूल की फीस नहीं दी। टीचर ने कहा है - जब तक फीस नहीं लाओगे, स्कूल मत आना। "

निर्मला," मेरी बच्ची, मुझे माफ़ कर दे। मेरी वजह से तेरा स्कूल भी छूट गया। "

काजल," नहीं मां, इसमें आपकी क्या गलती ? आपसे जितना हो पाता है, आप करती हो। "

निर्मला," मैं मालकिन से उधार लेकर तेरी फीस जल्दी भर दूंगी। ठीक है ना ? "

काजल," अब ये सब छोड़ो, चलो ना खाना खाते हैं। "

निर्मला जाती है और काजल के लिए खाना लेकर आती हैं।

काजल," क्या हुआ मां..? आपका खाना कहाँ है ? "

निर्मला," अरे ! वो मुझे भूख लगी थी तो मैंने पहले ही खा लिया था। तू अब खाले। "

काजल समझ जाती है कि उसकी माँ ने खाना नहीं खाया और जितना खाना था, वो उसे दे दिया। कई दिन गुजर गए लेकिन निर्मला काजल की स्कूल की फीस नहीं भर पाई। 

काजल भी समझ गई थी कि अब वह शायद स्कूल कभी नहीं जा पायेगी। 

एक दिन... 

काजल," माँ तुम काम पर चली जाती हो, मैं यहाँ अकेले रहती हूँ। मैं भी आपके साथ चलूँ, आपकी थोड़ी मदद भी कर लूँगी ? "

निर्मला," अच्छा, चल ठीक है। "

दोनों माँ बेटी जाती हैं। उन दोनों को देखकर अनीता जिसके यहाँ निर्मला काम करती थी, कहती है," अरे निर्मला ! ये कौन हैं ? "

निर्मला," मालकिन, ये मेरी बेटी है काजल। "

अनीता," तो तुम इसे यहाँ क्यों लाई हो ? "

निर्मला," मालकिन, वो... अकेली थी ये इसलिए आ गई मेरे साथ। "

अनीता," अच्छा अच्छा कोई बात नहीं, चलो जल्दी से काम पर लग जा। "

निर्मला काम करने लग जाती हैं और काजल वहाँ पड़ी एक बुक उठा लेती है और पढ़ने लग जाती है। इतने में अनीता वहाँ आ जाती है और कहती है। 

अनीता," अरे रे ! ये क्या कर रही है तू ? "

अनीता," निर्मला, अरे ओ निर्मला ! कहां है ? "

निर्मला," जी मालकिन, कहिए। "

अनीता," निर्मला, अपनी बेटी को देख पढ़ रही है। इसे घर के काम सिखा, वही इसके काम आएगा, ये पढ़ाई लिखाई नहीं। "

काजल," मालकिन, आप ऐसा क्यों कह रही हैं ? मैं पढ़ना चाहती हूँ। "


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अनीता," एक नौकरानी की बेटी होकर तू पढ़ाई करेगी ? जा जाकर काम कर। "

निर्मला चुपचाप काम करने लगती है लेकिन उसे अनीता की बातों का बहुत बुरा लगता है। वो काम करके घर पहुंचती हैं।
और माँ लक्ष्मी के सामने जाकर रोने लगती हैं। 

निर्मला (रोते हुए)," मैंने ऐसी क्या गलती कर दी जिसकी सजा मेरी बेटी को मिल रही है ? मैंने अपने पूरे जीवन में कभी किसी के साथ कुछ गलत नहीं किया, किसी के साथ कोई छल नहीं किया। 

फिर भी मैं अपनी बेटी को अच्छे से पढ़ा नहीं पा रही। उसे ढंग से दो वक्त का खाना नहीं दे पा रही। "

तभी उस मूर्ति से आवाज आई। 

मूर्ति," निर्मला, तुम परेशान मत हो। मनुष्य को जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लेकिन आज तुम्हारी सारी परेशानियों का अंत हो जाएगा। "

तभी एक बहुत तेज रौशनी में एक जादुई अंगूठी सामने आ जाती है।

निर्मला," माँ, मैं इस अंगूठी का क्या करूँगी ? "

मूर्ति," ये कोई साधारण अंगूठी नहीं है। ये एक जादुई अंगूठी है। इस अंगूठी से जो चीज़ तुम चाहोगी, वो तुरंत मिल जाएगी। बस इस अंगूठी को घुमाना और मुझे याद करना। "

निर्मला," धन्यवाद मां ! धन्यवाद...। "

मूर्ति," लेकिन निर्मला, एक बात का हमेशा ध्यान रखना कि ये अंगूठे किसी गलत व्यक्ति के हाथ नहीं लगनी चाहिए। "

निर्मला," जी मां, मैं ध्यान रखूंगी माँ। "

निर्मला वो अंगूठी पाकर बहुत खुश थी। 

निर्मला," यहाँ अभी कोई नहीं है। चलो इस अंगूठी की परीक्षा लेती हूँ। "

निर्मला अंगूठी को घुमाती हैं और माँ लक्ष्मी का ध्यान करते हुए अच्छे खाने की कामना करती हैं वैसे ही एक टेबल पर लज़ीज़ खाना आ जाता है। वो और उसकी बेटी पेट भरकर खाना खाते हैं और चैन की नींद सो जाते हैं।

एक दिन...
काजल," माँ, आप इस अंगूठी की मदद से मेरी फीस भर दो ना। "

निर्मला," हाँ मेरी बच्ची, मैं अभी इस अंगूठी की मदद से तुम्हारी फीस का इंतजाम करती हूँ। "

निर्मला फिर माँ लक्ष्मी का ध्यान करती है, अंगूठी को घुमाती हैं और पैसों की कामना करती है और उसे पैसे मिल जाते हैं। 

वो उन पैसों से काजल की फीस भर देती है। उस अंगूठी की मदद से निर्मला ने वो सब हासिल कर लिया, जो उसे चाहिए था। 

इसके साथ ही उसने अपने लिए बहुत सारी गाय खरीदीं जिनका दूध निकालकर वो बेचने लगी। थोड़े ही दिन में निर्मला की गरीबी दूर हो गई और वो अमीर हो गयी। 

उस अंगूठी की मदद से वो निर्धन लोगों की मदद करने लगी। लेकिन गांव के कई लोगों को ये बात खटकने लगी और लोग आपस में बात करने लगे। उसके पड़ोस में रहने वाली औरतें भी उससे जलने लगीं।

पड़ोस में रहने वाली दो औरतें बात करते हुए... 
पहली औरत," अरे जीजी ! इस निर्मला के पास ना जाने इतना धन कहाँ से आ गया ? कल तक तो इसके पास खाने को नहीं था और अब देखो सब है। "

दूसरी औरत," हाँ निशा, तू सही कह रही है। कुछ तो बात है। हमें इसका पता लगाना होगा। "

पहली औरत," हाँ जीजी, सही कह रही हो आप। दोनों देवरानी और जेठानी मिलकर निर्मला के घर की निगरानी करने लगीं और एक दिन उन्होंने निर्मला को उस अंगूठी का इस्तेमाल करते देखा। फिर क्या था..? एक दिन निशा (पहली औरत) ने मौका पाकर उस अंगूठी को चुरा लिया।

अगले दिन... 

निशा अपनी जेठानी के पास आई।

निशा," यह देखो जीजी मेरे पास क्या है ? "

निशा की जेठानी," अरे निशा ! यह तो वही एक अंगूठी है जिसकी वजह से निर्मला इतनी अमीर हो गई है। "

निशा," हां जीजी, यह वही अंगूठी है। "

निशा की जेठानी," ला ला मुझे दे। "

निशा," आपको क्यों दूं ? इसे चुराकर तो मैं लाई हूं ना। "

निशा की जेठानी," लेकिन बड़ी बहू तो मैं हूं ना इस घर में। जो चीज पहले आती है वो सबसे पहले मुझे दी जाती है। "

इस बात को लेकर दोनों में लड़ाई हो जाती है और मारपीट हो जाती है। लड़ते-लड़ते दोनों को काफी चोटें आ जाती हैं जिसकी वजह से वे बेहोश हो जाती हैं।

इधर निर्मला को अंगूठी नहीं मिल रही थी जिसकी वजह से वह काफी परेशान थी। वह घर के आस-पास अंगूठी ढूंढना शुरू कर दी है। तभी उसकी नजर बेहोश पड़ी निशा पर जाती है। 

जब निर्मला निशा के पास जाती है तो उसे नजर आता है कि निशा के साथ-साथ उसकी जेठानी भी बेहोश पड़ी हुई और निशा के हाथ में वही अंगूठी है।


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निर्मला," अंगूठी को पाने के चक्कर में यह जेठानी देवरानी आपस में लड़ रहे हैं। ऐसे तो बहुत से लोग इस अंगूठी को पाने के चक्कर में लड़ाई कर सकते हैं। मैं इस अंगूठी को ही खत्म कर दूं जिससे सभी का लालच ही खत्म हो जाएगा। "

निर्मला निशा के हाथ से अंगूठी लेती है और पास ही नदी में जाकर फेंक देती है और खुद अपनी गायों का दूध बाजार में बेचकर अपने परिवार के साथ खुशी-खुशी रहने लगती है।


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 बुद्धिमान रानी 


एक बार की बात है। जूनागढ़ में राजा भैरव सिंह नाम का राजा रहा करता था। वो एक अच्छे राजा थे। उनका एक छोटा भाई और एक पत्नी थी जिनके साथ वो खुशी से अपना जीवन बिता रहे थे।

राजा के छोटे भाई का नाम वीर था। बचपन से ही दोनों भाई हर चीज़ में काबिल थे। दोनों में काफी प्रेम था। 

एक बार जब राजा भैरव सिंह अपने छोटे भाई वीरसिंह के साथ एक लंबी यात्रा करके अपने राज्य लौट रहे थे।

राजा," देखिये यहाँ एक नदी है, थोड़ी देर रुक जाते हैं। घोड़े भी काफी देर से चल रहे हैं, वो भी थोड़ी देर पानी पी लेंगे। "

वीरसिंह," ठीक है, हम थोड़ी देर यहाँ रुकेंगे। "

घोड़े पानी पीते हुए और वहाँ छुपे राजा के दुश्मन...
दुश्मन राजा," जाओ, सब के सब छुप जाओ। जैसे ही मैं इशारा करूँ, राजा को मार देना और हाँ... सब लोग अपने मुँह अच्छे से ढक लेना। "

सिपाही," जी सरदार, आप बेफिक्र रहें। आज भैरवसिंह नहीं बच पाएगा। "

राजा," देखो, यह कितनी अच्छी जगह है। मन एकदम शांत हो गया। "

सेनापति," हाँ महाराज, आपने सही कहा। थोड़ी देर आराम करने के बाद हम सभी यहाँ से निकल जाएंगे। "

तभी कुछ दूर सामने जंगल में छुपे दुश्मन सिपाही राजा पर तीर चलाते हैं और सेनापति भीमसिंह राजा को बचा लेते हैं।

दुश्मन राजा," अरे ! नहीं, आज फिर ये सेनापति बीच में आ गया। "

सेनापति," महाराज, लगता है... कोई है जो आपको मारना चाहता है ? "

वीरसिंह," जाओ, महाराज को किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाओ। "

वीरसिंह," कौन है, किसने किया ये हमला ? सामने आओ वरना किसी को नहीं छोडूंगा। इन सब को घेर लो। आज यहाँ से कोई भी बचके ना जाने पाए। "

सेनापति," सैनिकों जाओ और इन सब को पकड़ लो। "

वीरसिंह," भैया को सही से किसी सुरक्षित जगह पर ले जाओ। इन्हें मैं देख लूँगा। "

राजा," अपना ध्यान रखना। "

वीरसिंह," आप जाओ भैया, इन्हें मैं देखता हूँ। "

सेनापति और राजकुमार वीर ने काफी देर तक उन सब का सामना किया। इसके बाद वो सब भाग गए। उन्हें हराने के बाद वो सब महल लौट आये।

राजा," सेनापति, आज आपने मेरी जान बचाई है। "

सेनापति," महाराज, ये आप कैसी बातें कर रहे हैं? आप हमारे महाराज है। आपके लिए हम अपनी जान तक दे सकते हैं। "

राजा," तुम्हारी वफ़ादारी पे मुझे गर्व है, सेनापति। "

राजा," और भाई वीर, तुम जैसा भाई किस्मत वालों को ही मिलता है। मैं बहुत खुश हूँ कि तुम मेरे भाई हो। "

वीरसिंह," कैसी बाते कर रहे हैं, भैया ? आप मेरे बड़े भाई हो, आपके लिए कुछ भी कर सकता हूँ मैं। 

वैसे भैया... मुझे कुछ कहना था आपसे, वो मैं कुछ समय के लिए तीर्थ पर जाना चाहता हूँ। भगवान की सेवा में अपना कुछ जीवन बिताना चाहता हूँ। "

राजा," मैं चाहता तो हूँ कि तुम्हें खुद से दूर ना जाने दूं। पर जब तुमने मन बना लिया है तो मैं तुम्हें नहीं रोकूंगा। "

दोनों भाई गले मिलते हैं। इसके बाद वीर चला गया। कुछ दिनों बाद जब देश में बसंत आने की खुशी में उत्सव की तैयारी चल रही थी, तभी राजा के पास दौड़ते हुए उनके सेनापति भीम पहुंचे।

राजा," क्या हुआ सेनापति भीमसिंह ? "

सेनापति," महाराज, आपके लिए पत्र आया है। "

राजा," पत्र... किसका पत्र ? "

सेनापति," महाराज, हमारे पड़ोसी देश के राजा भूषण सिंह जी का है। "

राजा," ठीक है, इधर दो। "

राजा (पत्र पढ़ते हुए)," हे राजा ! मैं राजा भूषण सिंह... हमारे पिता राजा वीरेंद्र सिंह अब नहीं रहे और इसी का फायदा उठाते हुए हमारे दुश्मन राजा ने हम पर हमला कर दिया है। 

हमें पिताजी द्वारा हमेशा से उनके और आपके पिताजी के बीच के अच्छे संबंधों के बारे में बताया गया था। आज इस कठिन समय में उनके अच्छे संबंधों को बनाए रखने का समय है। 

मैं आशा करता हूँ कि आप हमारी मदद करेंगे और दोनों देशों के बीच चली आ रही दोस्ती को बनाए रखेंगे... राजा भूषण सिंह। "

ये पत्र पढ़ते ही राजा को अत्यंत बुरा लगा।

राजा," सेनापति भीमसिंह, आज ही सेना को बता दीजिये कि वो युद्ध के लिए तैयार हो जाए। हम कल ही राजा भूषण सिंह की मदद के लिए उनके देश जाएंगे। "

मंत्री," महाराज, आपको तुरंत निकलना चाहिए। "

राजा," मंत्री भानु आप भी चलिए, युद्ध में हमें आपकी भी जरूरत पड़ेगी। "

मंत्री," महाराज, वो...। "

राजा," क्या बात है ? "

मंत्री,"वो... मैं कह रहा था कि महाराज अगर हम सब चले जाएंगे तो राज्य की रक्षा कौन करेगा ? और महारानी भी अकेली हैं, उनको अकेला रखना ठीक नहीं रहेगा। 

मैं ऐसा करता हूँ कि कुछ सैनिकों को महारानी और राज्य की देखभाल के लिए बोल देता हूँ। 

मगर महाराज सैनिकों के भरोसे तो नहीं छोड़ सकते ना? आप अपने किसी भरोसेमंद आदमी को छोड़ दीजिये। "

राजा," समझ नहीं आ रहा किसे रोकने को कहूं। "

मंत्री," महाराज, इसमें सोचने का क्या है ? मैं हूँ ना... जब तक मैं हूँ तब तक हमारे देश का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। "

राजा," ठीक है, तुम रुक जाओ। "

सेनापति," महाराज, मैं सैनिकों को कल के लिए तैयार करता हूँ। "

राजा," ठीक है। "

महाराज और सेनापति के जाते ही मंत्री भानु का कहता है।

मंत्री," जाओ महाराज जाओ, यह आपके जीवन का आखिरी युद्ध होगा क्योंकि मैं मंत्री भानु... हार कभी ना मानूं। "

मंत्री भानु दुश्मन राजा बृजभान से मिलने के लिए जाता है और उसे बताता है।

मंत्री," एक बढ़िया खबर लाया हूँ, महाराज। राजा भैरव सिंह अपने पड़ोसी राज्य के राजा भूषण सिंह की मदद के लिए उनके देश जा रहे हैं। हमारी योजना सफल हुई, महाराज क्योंकि मैं मंत्री भानु... हार कभी ना मानूं। "

दुश्मन राजा," तुम वापस लौट जाओ। मैं ये खबर उन को देकर आता हूँ। बाकी जो भी योजना होगी वो तुम तक पहुंचा दी जाएगी। "

मंत्री," जी महाराज। "

इसके बाद राजा बृजभान एक अजनबी से मिलता है।

बृजभान," काम हो गया है, अब बस बसंत उत्सव के दिन का इंतज़ार है। "

अजनबी," हाँ, उस दिन जब सब अपने काम पर लगे होंगे, हम राज्य में हमला कर देंगे और फिर पूरा राज्य हमारा होगा। "

जूनागढ़ राज्य में... 
दूसरी तरफ सेनापति भीम ने यह संदेश अपनी सेना को दिया।

सेनापति," हमारी सेना के महान योद्धाओ, राजा का आदेश है कि हम कल ही हमारे मित्र देश की मदद के लिए उनके देश जाएंगे। 

उनके देश पर हमला हुआ है इसलिए उन्होंने हमारे राजा से मदद मांगी है। हम सभी का ये कर्तव्य बनता है कि हम अपने राजा की आज्ञा का पालन करें। क्या आप सब तैयार है ? "

सेना," हाँ, हम तैयार हैं। हां, हम तैयार हैं। "

सेना का ऐसा उत्साह देखकर सेनापति बहुत प्रसन्न हुए। राजा ने सेनापति के साथ मिलकर जल्द ही सारी तैयारियां कर ली।

सेनापति," महाराज, आप विश्राम कीजिये। मैं कल के युद्ध की तैयारी करवाता हूँ। "

राजा," ठीक है भीमसिंह, मुझे तुम पर पूर्ण विश्वास है। "

राजा कमरे में जाता है। उसके बाद राजा रानी से बात करता है।

राजा," महारानी, आज हमें हमारे पड़ोसी राज्य के राजा भूषण सिंह का पत्र मिला। उनके देश में युद्ध का माहौल बना हुआ है। 

हमारे पिताजी के अच्छे संबंध होने की वजह से उन्होंने हमसे मदद मांगी है। और एक पुत्र होने के कारण अपने पिता के हर संबंधों का सम्मान करना मेरा दायित्व है। 

आज बहुत सारी तैयारी करनी थी जिसकी वजह से आपको ये सब बताने का वक्त ही ना मिल सका। "

महारानी," कोई बात नहीं महाराज, आप अपने कर्तव्य का पालन करें। "

राजा," आप इस राज्य का ध्यान रखना। "

महारानी," महाराज, आप चिंता ना करे। मैं आपकी गैरमौजूदगी में इस राज्य का ध्यान रखूंगी। आप पूरी लगन के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करें। मैं हर तरह से आपके साथ हूँ। "

राजा," और हाँ... इस बार का बसंत उत्सव हमारे लौटकर आने के बाद मनाया जाएगा ताकि बसंत उत्सव की खुशी दोगुनी हो जाए। "

महारानी," जैसी आपकी इच्छा महाराज, युद्ध की जीत की खुशी उत्सव की खुशी को दोगुनी कर देगी। "

सुबह होते ही राजा अपनी सेना के साथ अपनी मंजिल पर चल पड़े। बसंत के आने में करीब एक माह का समय था। रानी को अपनी कुलदेवी की पूजा में उन्हें एक साड़ी अर्पित करनी थी, जो कि रानी हर बार अपने हाथों से ही बनाती थी। 

इस बार साड़ी बनाते हुए रानी प्रजा को बताना भूल गई कि बसंत का उत्सव राजा के आने के बाद मनाना है। रानी को जैसे ही स्मरण हुआ, उन्होंने तुरंत संदेशवाहकों से बुलावा दे भेजा।

महारानी," राज्य में सबको बता दो कि इस बार बसंत उत्सव महाराज के आने के बाद मनाया जायेगा। "

कुछ दिनों बाद जब महारानी अकेली बैठी थी तभी उनसे उनका गुप्तचर मिलने आया।

गुप्तचर," महारानी, हमें यह संदेश मिला है कि आज से ठीक वसंत उत्सव के दिन हमारे देश में दुश्मनों का हमला होने वाला।
है। "

महारानी," क्या..? हमला इस समय... अभी तो महाराज भी यहाँ नहीं है। मैं उन्हें कैसे सूचित करूँ कि हमारा देश खतरे में है ? जाइए और महाराज को यह सूचित करिये कि देश को उनकी आवश्यकता है। "

गुप्तचर," जी महारानी, हमें ये भी पता चला है कि महल में कोई है जो दुश्मन की मदद कर रहा है। "

महारानी," क्या..? हमारे महल में जासूस, कौन है वो, गुप्तचर ? "

गुप्तचर," महारानी, ये तो मुझे नहीं पता। पर मैं कोशिश करूँगा कि मुझे जल्द ही उस जासूस के बारे में पता चल जाये। "

महारानी," अच्छा ठीक है, तुम जाओ। "

रानी पूरी रात भर यही सोचती रही कि कैसे उस जासूस का पता लगाया जाए ? तभी रानी को एक युक्ति सूझी। उन्होंने अपने भाई को एक पत्र लिखा। 

पत्र में...
भैया, हमारे देश में दुश्मन हमला करने वाले हैं। मुझे आपकी जरूरत है। महाराज भी युद्ध में गए हैं। इसी का फायदा दुश्मनों ने उठाया है। 

आप बसंत उत्सव के दिन सुबह होने से पहले अपनी सेना को लेकर हमारी सरहद की दिशा में फैल जाना ताकि जैसे ही दुश्मन वापस जाने की कोशिश करे वैसे ही आप उसे पकड़ लें और आप मेरे भतीजे अरविंद को मेरी मदद के लिए भेज दीजिए। 


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हमारे महल में कोई गुप्तचर है जो हमारे लिए बहुत बड़ा खतरा है। मुझे उसकी मदद की जरूरत पड़ेगी। लेकिन अरविंद से कहना कि वो महात्मा की तरह बनकर आये और अपने साथ कुछ लोगों को उसकी तरह पंडितों के कपड़े पहनाकर लाये। 

मैं सबको कह दूंगी कि आप मेरे मायके के सिद्ध पंडित है। इस बार देवी की पूजा के लिए मैंने आपको बुलाया है तो बस उसे कहना कि वो जल्दी पहुँच जाये।

रानी के बोलने पर अरविंद महापंडित बनके बहुत जल्द वहाँ पहुँच गए। उनके आने के बाद सब जगह उनकी जय जयकार होने लग गयी। ये बात जब भानु को पता चली तो उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने महारानी से पूछा।

मंत्री," अब यह महात्मा लोग महल में क्या करने आये हैं, महारानी ? आपने इन्हें क्यों बुलाया है ? "

महारानी," आप तो जानते है, महाराज युद्ध में गए है और मुझे उनकी चिंता है ? उनकी सलामती के लिए मैंने इनको बुलाया है। ये जिनसे भी खु़श होते हैं, उनकी मन की इच्छा पूरी कर देते हैं। "

मंत्री," क्या महारानी सच में, ये इच्छा पूर्ण कर देते हैं ? "

मंत्री (मन में)," इसलिए मेरा नाम है भानु... हार कभी ना मानूं। "

महारानी," हाँ, तुम्हें क्या लगता है, मैं ऐसे किसी से अपनी कुलदेवी की पूजा करवा दूंगी ? "

मंत्री (मन में)," क्यों ना महापंडित को खुश कर दूँ। क्या पता वो मेरी इच्छा पूरी कर दें ? "

सबके जाने के बाद मंत्री महापंडित के पास पहुंचता है।

मंत्री," महापंडित जी, मैं मंत्री भानु प्रसाद यहाँ का राज्यमंत्री हूँ। आपको किसी भी चीज़ की जरूरत हो तो आप मुझे बताना, मैं आपका पूरा ख्याल रखूँगा। वैसे महारानी बता रही थी कि आप किसी की कोई भी इच्छा पूरी कर सकते हो। "

अरविंद," कोई शक..? वत्स, महात्मा लोग हैं हम। "

मंत्री," नहीं नहीं महापंडित जी, मैं तो बस है पूछ रहा था आपसे।
महापंडित जी, मेरी भी एक है इच्छा हैं वो काफी समय से पूरी नहीं हो रही है। 

इस बार वो बस पूरी ही होने वाली है। बस आप आशीर्वाद दे दीजिए कि वो बिना किसी परेशानी के पूरी हो जाये। "

महापंडित," अगर तुम चाहते हो कि तुम्हारी इच्छा पूरी हो जाए तो तुम्हें आज रात से लेकर तब तक तालाब में एक एक करके पत्थर डालने होंगे जब तक कि तुम्हारे पास कोई सुन्दर उड़ता हुआ घोड़ा ना जाए। 

तुम्हारी इच्छा पूरी हो जाएगी। पर तुम्हें ध्यान रखना होगा कि तुम्हें ये करते हुए कोई देख ना ले। अगर तुमने ज़रा सी चालाकी करी तो तुम्हारी इच्छा कभी पूरी नहीं होगी। "

मंत्री," नहीं नहीं, मैं करूँगा ना। आप बस बताइए कि इच्छा तो पूरी हो जाएगी, ना ? "

महापंडित," हाँ हाँ, हो जायेगी। और हाँ... एक बात का ध्यान रखना, बस तब तक किसी से बात मत करना। "

मंत्री भानु आधी रात में किसी से मिलने जाते हैं।

अजनबी," काम हो गया ? "

मंत्री," जी, काम हो गया है। यहाँ सब पूजा की तैयारियों में लगे हुए हैं। इन सबको क्या पता, ये इनकी आंखरी पूजा है ? "

अजनबी," ध्यान से काम करना, अगर गड़बड़ी हुई अपनी जान से हाथ धो बैठोगे। "

मंत्री," आप चिंता मत करिए। किसी को शक नहीं होगा। वो सब तो राजा की सलामती के लिए पूजा में लगे हुए हैं। "

अजनबी," मुझे हर छोटी चीज़ की खबर समय पर मिल जानी चाहिए। "

मंत्री," जी, वो मैं कह रहा था कि मैं आने वाले दिनों में आपसे मिल नहीं पाऊंगा। महारानी ने मुझे बाकी सब चीजों में उलझाया है तो आपसे मिलने का समय नहीं मिल पा रहा। 

जैसे तैसे आज मिल पाया हूँ। अगर आज के बाद ऐसे निकला तो किसी को शक ना हो जाये ? "

अजनबी," हां, तुम सही कह रहे हो। ठीक है, तुम नज़र रखना बस। "

मंत्री (मन में)," अब मैं महापंडित जी के बताए नुस्खे को आराम से कर पाऊंगा। इसलिए मेरा नाम है भानु... हार कभी ना मानूं। "

उसके बाद अजनबी दुश्मन राजा से मिलने घोड़े पर बैठके निकलता है।

अजनबी," बृजभान, सब कुछ योजना के मुताबिक ही होना चाहिए। छोटी सी भूल हम सबको मरवा सकती है। इसलिए ध्यान रखना इस बात का। "

बृजभान," आप बेफिक्र हो जाईये, सब कहे अनुसार ही होगा। "

अजनबी," हमें सुबह होते ही राज्य में हमला करना होगा; क्योंकि मुझे पता है की राजा कभी भी वापस आ सकता है। 

इसलिए सभी जगह अपने सैनिक तैनात कर दो और याद रहे... छोटी सी गलती भी ना हो पाए। "

उसके जाने के बाद महापंडित ने अपने सैनिकों को आधी रात में महारानी को उनसे मिलने को कहा। आधीरात को रानी अरविंद से मिलने आई।

महारानी," सुनो अरविंद, तुम पूजा में पंडित की जगह बैठोगे और सारी प्रजा को बसंत उत्सव की सुबह होने से पहले आधी रात के समय हाथ में मशाल लेकर तुम्हारे पीछे पीछे आने को कहना और तुम मौका पाते ही सरहद की दिशा में 'माता रानी की जय... माता रानी की जय' का नारा लगाते हुए जाना शुरू कर देना। "

अरविंद," जी बुआ, आप परेशान ना हो, सब योजना के मुताबिक होगा। "

दोनों अपने अपने कमरे में लौट गए। सुबह बसंत उत्सव से पहले पूजा हुई।

अरविंद," सुनिए... आप सब बसंत उत्सव की सुबह होने से पहले आधी रात के समय हाथ में मशाल लेकर जहाँ जहाँ मैं जाऊ, वहाँ वहाँ चलते रहना और 'माता रानी की जय' का नारा लगाते रहना। माता हम सब पर कृपा बनाए रखेंगी। "

बसंत उत्सव के दिन सुबह होने से पहले सभी लोगों को लेकर महापंडित सरहद की दिशा में जाने लगे। वहाँ जैसे ही दुश्मनों ने रौशनी को अपनी ओर आते हुए देखा, वे सब डर गए।

बृजभान," लगता है... राजा को हमारी साजिश के बारे में पता चल गया है ? हमें तुरंत वापस जाना होगा। "

जैसे ही वे कुछ दूरी तक पहुँच पाए वैसे ही उन्हें राजा मालसार और राजा भैरव सिंह, दोनों की सेनाओं ने दुश्मनों को घेर लिया।

राजा," बताओ... तुमने ये सब क्यों किया ? मेरी गैरहाजिरी में ये वाला कृत्य है तुम्हें शोभा देता है ? "

बृजभान," तुम्हारे पिता ने हमारे पिता को हमेशा युद्ध में पराजित किया और उन्हें उन्हीं के देश में अपमानित कर दिया। 

इसी का बदला लेने के लिए मैंने तुम्हारे मित्र देश पर पहले हमला किया और वहाँ तुम्हें भिजवाकर तुम्हारे देश पर हमला करने के लिए चला आया। लेकिन मेरी चाल उल्टी पड़ गयी। "

राजा," मुझे बताओ, इस समय तुम्हारा साथ किसने दिया ? बिना किसी गद्दार के यह संभव नहीं। "

बृजभान," तुम्हारे भाई और मंत्री भानु ने। "

राजा," क्या, वीर ने तुम्हारी मदद की ? वो ऐसा नहीं कर सकता। "

बृजभान," ये सच है। कुछ महीनों पहले जब तुम्हारे ऊपर हमला हुआ। उसके बाद जब वीर तीर्थ पर निकल गए थे। असल में वो पता करने निकले कि वो हमला किसने किया है ? 

जब उन्हें पता चला कि इन सबके पीछे मेरा हाथ है तो वो मेरे पास आये। मैं डर गया था। मुझे लगा, मैं मारा जाऊंगा। 

पर राजकुमार वीर ने मुझको आपको मारने का आदेश दिया और उनकी बात न मानता तो वो मुझे मरवा देते। इसलिए मैं मान गया। "

राजा," वीर और भानु जहाँ भी हैं, उन्हें तुरंत पकड़ लो। उनका फैसला हम राजदरबार में करेंगे। और तुम बृजभान... अगर तुमने आज के बाद हमारे देश पर आंख उठाकर भी देखा तो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा। सोचो कैसा लगेगा, अगर मैं तुम्हें कारागार में कैद कर दूँ ? "

बृजभान," मुझे क्षमा कर दें,महाराज। मैं आपका अपराधी हूँ। "

राजा," मैं जानता हूँ कि कैसा लगता है जब एक देश अपने राजा के बिना मुश्किलों का सामना करता है ? 

इसलिए जाओ, अपने देश वापस लौट जाओ और आगे से कभी भी इस तरह के ख्याल अपने दिमाग में मत लाना। 

क्योंकि अगली बार मैं दया नहीं दिखाऊंगा। जाओ, अपने देश की रक्षा करो और एक अच्छे राजा बनो। "

बृजभान," धन्यवाद महाराज ! आप सच में दयालु और महान है। आपका ये अहसान मैं कभी नहीं भूलूंगा। "

उसके पश्चात राजा महल में लौटे।

राजा," जाओ, भानु को मेरे सामने लाओ। "

सेनापति," पकड़ो इस भानु को। "

मंत्री," अरे ! रुक जाओ, कहाँ ले जा रहे हो ? अरे रे ! कहाँ ले जा रहे हो ? "

मंत्री," सेनापति, तुम कब लौटे ? अरे रे ! रुको। "

सेनापति," लीजिये महाराज, हम भानु को ले आये और ये है राजकुमार वीर। "

मंत्री," महाराज, देखिए ना... ये सेनापति मुझे किस तरह से पकड़कर ले आए हैं ? "

राजा," क्या हुआ मंत्री भानु ? आपको उड़ने वाला घोड़ा दिखा कि नहीं ? "

मंत्री," आपको कैसे पता है इस बारे में ? "

राजा," भला मुझे कैसे पता नहीं चलेगा ? आखिर महापंडित है हम। "

मंत्री," क्या..? "

राजा," इस भानु को ले जाओ और इसे बंद कर दो कारागार में।
और वीर तुम... तुम्हें तो मैंने अपना सब कुछ माना था। 

तुमने जब जाने की बात की तो मैं कई दिनों तक दुखी था; क्योंकि बचपन से ही तुम से ज्यादा अपना मेरा कोई नहीं था। तुम ये सब कैसे कर सकते हो ? "

वीर," बचपन से ही हम दोनों हर चीज़ में बराबर थे। चाहे वो बुद्धि हो या शक्ति तो फिर क्यों महाराज तुम्हें बनाया गया क्योंकि तुम बड़े हो इसलिए ? 

एक बार भी मैं कितना काबिल हूं, ये जानने की किसी ने कोशिश तक नहीं की। एक ही परिवार में इतना भेदभाव कैसे ? 

क्या राज़गद्दी बड़े छोटे के भेद से मिलती है ? अगर आज ये सब ना होता तो तुम मेरी जगह होते और मैं तुम्हारी जगह। "

राजा," वीर... मेरे भाई, एक बार प्यार से कहा होता तो मैं सारा राजपाट त्याग संन्यास ले लेता। लेकिन राजद्रोह कदापि मंजूर नहीं। "

राजा," जाओ, इसे कारागार में डाल दो। मैं इसका चेहरा तक नहीं देखना चाहता। आज इस धोखे ने मेरा बहुत दिल दुखाया है। "

राजा," लेकिन महारानी, मैं आपसे बहुत खुश हूँ। आज आपकी वजह से मेरी प्रजा सुरक्षित है और मेरा अस्तित्व बना हुआ है। मैं आप का जितना शुक्रियादा करूँ उतना कम है। "

महारानी," ये कैसी बातें कर रहे हैं ? ये सब आपकी ही नहीं मेरी भी प्रजा है। इन सब की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है। मैंने कहा था ना कि मैं आपके साथ सदैव खड़ी रहूंगी। "

राजा," राजा मलसार, आपने इन दिनों हमारी जो भी मदद की, हम आपके बहुत आभारी हैं। "

राजा मलसार," अरे महाराज ! कैसी बातें कर रहे हैं ? हम एक परिवार हैं। जब हमें आपकी जरूरत पड़ी तो मदद कर देना। "

सब हंसने लगे।

राजा," बिलकुल... हम हमेशा आपकी मदद के लिए तैयार रहेंगे। "

राजा," एक बात बताइए महारानी, आपको कैसे पता चला कि मंत्री ही जासूस है ? "

महारानी," महाराज, जब अरविंद महापंडित बनके महल आया था तब मैंने देखा कि मंत्री भानु कुछ ज्यादा ही उतावले थे महापंडित को मिलने के लिए। 

बाद में जब मंत्री भानु महापंडित से मिलने गए तो अरविंद को भी भानु पर शक हुआ। इसलिए हमने भानु के पीछे जासूस लगा दिए और भानू को इच्छा पूरी करने वाली विधि में लगा दिया ताकि वो हमारी योजना को ना समझ पाए। "

राजा," वाह महारानी वाह ! अति उत्तम। "

महारानी," पर महाराज, राजा भूषण सिंह के यहाँ कैसी परिस्थितियां है ? "


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राजा," महारानी, हमने और राजा भूषण सिंह ने मिलकर दुश्मनों को देश से निकाल भगाया। सेना अधिक थी इसलिए ये काम जल्दी ही हो गया। मुझे जैसे ही गुप्तचर ने यहाँ के बारे में बताया, मैं वैसे ही वहाँ से चला आया। "

महारानी," महाराज, मुझे तो इस बात की खुशी है कि आप सही सलामत लौट आये। ये तो बड़ी खुशी की बात है। हमें इस बार के उत्सव में उन्हें भी बुलाना चाहिए। "

राजा ने राजा भूषण सिंह को उत्सव में सम्मिलित होने का न्यौता भिजवाया। सभी के आने के बाद बसंत उत्सव देश में बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। 


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जिन्न का बदला | Jinn Ka Badla | Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories

जिन्न का बदला | Jinn Ka Badla | Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories


कहानियां हमारी जीवन में एक दर्पण का कार्य करती है। यह हमेशा किसी पाठक के लिए आनंदित माहौल पैदा करने के साथ-साथ, उसे कुछ नया भी सिखाती हैं। अगर आप Hindi Stories, Moral Stories या Bedtime Stories पढ़ने के शौकीन हैं तो आज मैं आपके साथ एक नई कहानी साझा करने जा रहा हूं। इस कहानी का नाम है - जिन्न का बदला। यह एक Magical Story है, तो कहानी में हमारे साथ अंत तक जुड़े रहें।

जिन्न का बदला | Jinn Ka Badla | Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories

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 जिन्न का बदला 


यह बात सन 1907 के दशक की वजह है। जब दूर चंदनपुर नाम का एक गांव था जो रुस्तमपुर रियासत के अंतर्गत आता था। 

रुस्तमपुर के राजा मानिकचंद का जो महल था वह इसी चंदनपुर गांव में बना हुआ था जो बेहद आलीशान था। 

राजा का महल 'चंदनपुर की कोठी' के नाम से पूरे क्षेत्र में विख्यात था। राजा मानिकचंद दरबार में आए किसी दीन दुखियों की मदद नहीं करता था। 

वह केवल अपने सुख पर ध्यान देता था ना कि प्रजा के दुख पर। एक दिन एक भिखारी राजा के राज दरबार में आता है।

भिखारी," महाराज, मैं बहुत बुरी स्थिति में हूं। कृपया मेरी मदद कीजिए।

राजा," अरे ! इसे अंदर किसने आने दिया। निकालो इसे यहां से। मैं इन लोगों की मदद करने के लिए यहां नहीं बैठा हूं। "

 वह भिखारी रोता हुआ वहां से चला जाता है। 

राजा," मंत्री जी, ऐसे लोगों को अंदर घुसने ही मत दीजिए। "

इसी तरह जो भी मदद मांगने आता उसे राजा मानिकचंद बेइज्जत करके निकाल देता। एक रात राजा मानिकचंद महल के पास टहल रहा था कि तभी किसी की आवाज आती है। 

अघोरी," मदद करो... मेरी मदद करो। कृपया मेरी मदद करो। "

राजा," यह किसकी आवाज आ रही है ? "

राजा मानिकचंद देखता है कि महल के पास ही एक अघोरी बुरी स्थिति में है और मदद के लिए पुकार रहा है।

राजा," क्या हुआ है तुम्हें ? "

अघोरी," मैं बहुत ही बुरी स्थिति में हूं। मेरी तबीयत बहुत खराब है। कृपया मेरी मदद करो। "

राजा," हट... मैं किसी की मदद नहीं करता। तुम लोगों का नाटक में खूब समझता हूं। चलो चलो निकलो यहां से। "

अघोरी," मैं सच कह रहा हूं। कृपया मेरी मदद करो। "

राजा," मुझे कुछ नहीं सुनना, तुम निकलो यहां से। "

अघोरी,"तुम बहुत बुरे इंसान हो। देखना एक दिन इसके बदले में तुम्हें क्या-क्या झेलना पड़ेगा ? " 

राजा मानिकचंद अघोरी की बात नहीं सुनता और वहां से चला जाता है। अगले दिन पता चलता है कि उस अघोरी ने महल के बाहर ही अपने प्राण त्याग दिए। 

राजा," मंत्री जी, जल्द से जल्द इसकी लाश को ठिकाने लगवा दो। "

मंत्री," जी महाराज, अभी लगवाता हूं। "

कई महीने बीत जाते हैं। फिर एक दिन कुछ लोग मानिकचंद से मिलने आते हैं और किसी गंभीर मुद्दे पर बात करते हैं। 

अगले दिन...
राजा," मंत्री जी, कल कुछ लोग आए थे। कह रहे थे कि हमारे राज्य पर कुछ संकट आने वाला है। "

मंत्री," हां महाराज, सुनने में तो ऐसा आ रहा है कि ये राजपाट ज्यादा दिन तक नहीं रह पाएगा। "

राजा," शुभ शुभ बोलिए मंत्री जी, शुभ शुभ बोलिए। "

जैसी खबर आ रही थी, वैसा ही होता है। बढ़ते कालक्रम कौर बदलते दौर के साथ एक दिन वक्त की मार राजा मानिकचंद की रियासत पर पड़ी। 

सरकार ने सारी रियासतों का विलय भारत सरकार के अधीन कर दिया था। सभी राजाओं की रियासतें उनसे छीनी जाने लगीं। मानिकचंद भी उनमें से एक थे।

राजा मानिकचंद अब अपनी रियासत के लोगों में सिर्फ मानिकचंद हो गए थे। रुतबा बरकरार रखने के लिए रियासत में कब्जा की गई जमीनें बेचे जाने लगी और जमीन बेच कर आए पैसों से शान और शौकत बरकरार रखने की कोशिश की जाने लगी। 

धीरे-धीरे सभी जमीन जायदाद खत्म हो गई और मानिकचंद फकीर हो गए। इसी के साथ मानिकचंद का सारा घमंड कांच की तरह टूट कर चूर-चूर हो गया। 

अब मानिकचंद को एक आम इंसान के दुखों के बारे में पता चल रहा था। एक दिन अचानक मानिकचंद की पत्नी ने कहा।

पत्नी," आप तो ठहरे राजा साहब, आपके लिए तो मेहनत मजदूरी बनी ही नहीं। घर का खर्च चलाने के लिए लग रहा है कि मुझे ही काम करने के लिए घर की दहलीज लांघने की जरूरत होगी। "

राजा," राज परिवार के घर की बहुओं को लाज परदे में ही रखा जाता है। "

राजा मानिकचंद को अपनी पत्नी की यह बात इतनी बुरी लगी कि उन्हें खुद से आत्मग्लानि होने लगी। 

राजा (मन में)," यह सब मेरी ही करनी का फल है। मैंने आज तक इतने गलत काम किए, उसकी सजा है ये। 

सबको दुख दिया और अपना राजधर्म छोड़कर भोग विलास मैं लुप्त रहा, यह उसी की सजा है। "

गांव के बाहरी तरफ एक खंडहर हो चुका एक मंदिर था। वहां पर पूजा पाठ नहीं होती थी और ना ही उधर कोई आता-जाता था। 

मानिकचंद उस मंदिर में जाकर बैठ गया। सारी बातें सोच सोच कर मानिकचंद अपना आपा खो देता है और मंदिर की चौखट पर अपना सिर पटक पटक कर अपनी जान देने की कोशिश करने लग जाता है। 

सिर पटक पटक कर होने वाला दर्द राजा की बुद्धि के द्वार खोल देता है। उसे यह आभास हुआ।

राजा," मेरे ना होने से मेरी पत्नी और मेरे राज्य के हालात और भी ज्यादा बिगड़ते जायेंगे। नहीं नहीं... मैं आत्महत्या नहीं कर सकता। "


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इस तरह मानिकचंद ने आत्महत्या का इरादा बदल दिया। सिर पटकने की वजह से खून बहुत निकल रहा था और वह खून उसी खंडहर के पास रखें एक फूलदान पर जा गिरता है। 

जैसे ही खून उस फूलदान में गिरता है, फूलदान में से एक जिन्न निकलकर बाहर आता है।

जिन्न," मानव के खून की प्यास आज जाकर बुझ पाई है। हा हा हा हा... मैं आजाद हो गया। "

राजा," कौन हो तुम ? "

जिन्न," मैं इस खंडहर का जिन्न हूं। इसी फूलदान में रहता हूं। एक अघोरी ने मुझे 70 साल पहले इसी फूलदान में कैद कर दिया था। "

राजा," फिर तुम बाहर कैसे आ गए ? "

जिन्न," अघोरी ने कहा था कि मेरे मरने के बाद किसी भी इंसानी खून के स्पर्श से मुझे मुक्ति मिल जाएगी। लग रहा है वह अघोरी मर गया। "

जिन्न की यह बात सुनते ही मानिकचंद को उस रात की बात याद आती है जब एक अघोरी ने उससे मदद मांगी थी और उसने मदद करने से मना कर दिया था। उसके अगले ही दिन उस अघोरी की मृत्यु हो गई थी।

राजा जिन्न से पूछता है। 

राजा," तो अब क्या इरादा है तुम्हारा..? "

जिन्न," मैं तुम्हारे शरीर पर कब्जा करके इस दुनिया में राज करूंगा। "

राजा," वो कैसे..? " 

जिन्न," जिस शरीर के खून से मुझे मुक्ति मिलेगी उस शरीर को धारण कर लेने से मेरी शक्ति 7 गुना बढ़ जाएगी। मैं तुम्हें खत्म करके तुम्हारा शरीर हासिल कर लूंगा, हा हा हा...। "

राजा," मुझे छोड़ दो। अभी कुछ देर पहले तक मुझे मौत का बिल्कुल भी डर नहीं था। पर अब मुझे अपने परिवार और राज्य की चिंता हो रही है। "

जिन्न," कैसी चिंता ? बोलो, मैं तुम्हारे शरीर के बदले कुछ भी करने को तैयार हूं। "

राजा," यह एक बहुत बड़ा निर्णय है जिसे मैं तुरंत नहीं ले सकता। मुझे मेरे परिवार से इस बारे में चर्चा करनी होगी। "

जिन्न," ठीक है, यह इत्र लो। मैं तुम्हें 1 महीने का वक्त देता हूं। यह इत्र 1 महीने तक खत्म नहीं होगा। 

इस इत्र की खुशबू जहां तक चलेगी, तुम्हारा राज पाठ तुम्हें वहां तक मिलता रहेगा। उस क्षेत्र में मौजूद लोग तुम्हें फिर से राजा मानने लगेंगे। "

राजा," ठीक है, मैं तैयार हूं। "

जिन्न," याद रहे... ठीक 1 महीने बाद तुम अपने आप अपनी स्थिति में बेहोश हो जाओगे और तुम्हारे शरीर पर मेरा कब्जा हो जाएगा। फिर मैं इस दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान बन जाऊंगा, हा हा हा...। "

राजा जिन्न का दिया हुआ इत्र अपने शरीर पर लगाता है और अपने महल की तरफ बढ़ने लगता है। जहां-जहां से राजा गुजरता गया, वहां वहां पर उसे अद्भुत बदलाव देखने को मिले।

उसके महलों में करदाताओं का आना फिर से चालू हो गया। रियासतों की दीवारें फिर से चमकने लगी। 

जिन्न के दिए हुए इत्र की खुशबू ने राजा मानिकचंद की राजाशाही को फिर से लौटा दिया। एक दिन राजशाही के वापस मिलने के बारे में राजा की पत्नी ने राजा से जिक्र किया। 

रानी," इतना बदलाव कैसे हो रहा है ? "

राजा," ये शोहरत मेरे जीते जी बस कुछ ही दिनों की मोहताज है। "

राजा ने पूरी बात अपनी पत्नी को बताई। यह सब सुन रानी जोर जोर से रोने लगी। 

रानी (रोते हुए)," उस जिन्न से कहिए कि अपना सारा राजपाट वापस ले जाए, मैं आपको कहीं नहीं जाने दूंगी। "

राजा," अब कुछ नहीं हो सकता। 1 महीने के बाद मेरी मृत्यु निश्चित है। मैं बस 1 महीने का जीवन इसलिए बचाकर जी रहा हूं ताकि अपने परिवार को इस काबिल कर जाऊं कि वापस तुम्हें इस दहलीज को पारकर काम करने के बारे में सोचना भी ना पड़े। "

रानी," मैं कहीं नहीं जाऊंगी और ना ही आपको जाने दूंगी। "

राजा," खुद पर काबू लाओ। कल एक महीना पूरा हो जाएगा और मैं कल हमेशा तुम लोगों को छोड़कर चला जाऊंगा। "

वह रात और आने वाला दिन पूरी तरह डर में बीतने लगा। राजा महीने के आखरी दिन उस जिन्न के वापस आने का इंतजार करने लगा। सुबह से लेकर शाम बीत गई पर जिन्न नहीं आया।

राजा के मन में जीवन के प्रति चेष्टा और चाहत बढ़ने लगी। राजा को लगा कि जिन्न शायद भूल गया कि उसे आज मेरा शरीर लेने वापस आना है। फिर अचानक ही राजा के मन में विचार आया।

राजा (मन में)," यह गलत है जिन्न ने अपने किए हुए वादे अनुसार मेरा राजपाट मुझे लौटा दिया। मेरा परिवार मेरे ना होने के बावजूद सुख में जीवन जी सकता है। 

मुझे भी मेरा कर्तव्य निभाना होगा। मैं इतना लोभी नहीं हो सकता। मुझे राजधर्म निभाना होगा। "

यह सब सोचकर राजा वापस उस खंडहर वाले मंदिर में पहुंचकर उस जिन्न को खोजने लगा। 

राजा (आवाज लगाते हुए)," कहां हो जिन्न ? देखो, मैं वापस आ गया हूं। तुम मेरा शरीर ले सकते हो। "

तभी अचानक से जिन्न प्रकट हुआ। 

जिन्न," तुम आ गए मानिकचंद..? "

राजा," हां, तुम्हारे इस इत्र की खुशबू ने मेरा राजपाट मुझे वापस कर दिया। इसके लिए शुक्रिया ! अब मेरे अपने कहे अनुसार मैं अपना शरीर तुम्हें वापस देने आया हूं। "

जिन्न," तुम तो सच में एक ईमानदार राजा निकले। हा हा हा... अपनी जुबान का ईमानदार होना ही एक राजा का पहला कर्तव्य होता है। "

राजा," मैं अपनी ईमानदारी पर अडिग हूं। "

जिन्न," हा हा हा...। "

राजा," क्यों इतना हंस रहे हो तुम..? "

जिन्न," एक बार सिर घुमाकर अपने आसपास देखो। "

राजा अपने चारों तरफ देखता है तो वह खंडहर एक खूबसूरत मंदिर बन चुका था।

राजा," यह खंडहर एक आलीशान मंदिर कैसे बन गया ? "

जिन्न," तुम्हारे इत्र को लगाकर इस मंदिर में आ जाने से इस मंदिर का भी कायाकल्प हो गया और यह भी एक तीर्थ स्थान बन गया। "

राजा," तो..? इससे मेरी मृत्यु का क्या संबंध ? तुम अपना कार्य करो। ले जाओ मेरा शरीर। "

जिन्न," जब तक मैं इस खंडहर में था तब तक इस खंडहर का एक जिन्न हुआ करता था। मेरी मति भी राक्षसों वाली थी। अब मैं इस समय तीर्थ मंदिर में मौजूद हूं। मैं तुम्हारा शरीर और प्राण नहीं ले सकता। "

राजा," इस खंडहर के मंदिर बन जाने से तुममें क्या परिवर्तन आ गया भला ? "

जिन्न," यह खंडहर ही मेरा घर था; क्योंकि कई सालों से मैं इसी खंडहर में कैद था। तुमने मुझे इस खंडहर से जब आजाद कराया तब भी मैं 1 जिन्न ही था; क्योंकि यह स्थान तब भी एक खंडहर ही था। 

लेकिन अब इस खंडहर के तीर्थ बनने से मेरी राक्षसी प्रवृत्तियों का नाश हो गया है। जाओ, तुम आज से आजाद हो। तुम्हारी मृत्यु तुम्हारे समय के अनुसार ही आएगी। "

राजा," ठीक है, मैं इस तीर्थ में यज्ञ करवाऊंगा और इस परोपकार की कथा सबको सुनाऊंगा। "


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राजा मानिकचंद को वापस जीवित देखकर उसके परिवार में खुशियां वापस आ गई। कुछ ही दिनों में उस खंडहर वाले मंदिर में यज्ञ हुआ और परोपकार की कथा सुनाई गई। 

धीरे-धीरे वो मंदिर 'चंदनपुर के तीर्थ' के नाम से मशहूर हो गया। साथ ही राजा मानिकचंद और चंदनपुर गांव के जिन्न की कहानी परोपकार की कथाओं में प्रचलित हो गई। 

राजा मानिकचंद अब सभी के दुखों को सुनता और सभी की मदद करता था।


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ठग और किसान | Thug Aur Kisaan | Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories

ठग और किसान | Thug Aur Kisaan | Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories


कहानियां हमारी जीवन में एक दर्पण का कार्य करती है। यह हमेशा किसी पाठक के लिए आनंदित माहौल पैदा करने के साथ-साथ, उसे कुछ नया भी सिखाती हैं। अगर आप Hindi Stories, Moral Stories या Bedtime Stories पढ़ने के शौकीन हैं तो आज मैं आपके साथ एक नई कहानी साझा करने जा रहा हूं। इस कहानी का नाम है - ठग और किसान। यह एक Kisaan Ki Kahani है, तो कहानी में हमारे साथ अंत तक जुड़े रहें।

ठग और किसान | Thug Aur Kisaan | Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories

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 ठग और किसान 


धौलपुर नामक गांव में चंदन अपनी पत्नी के साथ रहता था। दोनों पति-पत्नी मिलकर खेती और पशुपालन का काम करते थे। 

चंदन सीधा-साधा व्यक्ति था। वह अपने बैल लेकर खेतों पर जाने के लिए तैयार हुआ लेकिन तभी उसकी पत्नी सुंदरी ने रोका।

सुंदरी," आप आज भी खेतों पर जा रहे हो ? "

चंदन," आज खेतों पर बहुत काम है। पर तुम ऐसे क्यों टोक रहे हो ? "

सुंदरी," पड़ोस के गांव में आज पशुओं का मेला लगा है। आपको वहां जाना था ना ? आप बोल रहे थे कि एक बैलों की जोड़ी और लेनी है। "

चंदन," अरे ! हां, मैं तो भूल ही गया था। मुझे बैलों की नई जोड़ी लेनी है। मेरी सुंदरी, तुम याद ना दिलाओ तो आधे काम मैं भूल ही जाऊं। "

सुंदरी," हां तो... अब देर मत कीजिए, चलिए जाइए। मैं यहां का सारा काम संभाल लूंगी। "

चंदन," ठीक है, मैं अभी जाता हूं। "

चंदन पड़ोस के गांव के मेले में गया। उसने दो बैलों की एक सुंदर जोड़ी खरीदी। चंदन को बाजार में शाम हो गई। 

चंदन बैलों को लेकर अपने गांव धौलपुर की तरफ चलने लगा। तभी रास्ते में उसे दो व्यक्ति (बिल्ला और कालिया) मिले। 

बिल्ला," वाह वाह ! बहुत अच्छे...। "

चंदन," जी... मैं कुछ समझा नहीं ? "

बिल्ला," तुम बैलों की बहुत खूबसूरत जोड़ी लेकर आए हो। "

कालिया," बैलों को देखकर लगता है, काफी महंगे बैल लाए हो। "

बिल्ला," काफी समझदार भी लगते हो। "

कालिया," नहीं, ज्यादा महंगे खरीद लिए हैं इसलिए समझदार नहीं है। "

चंदन," भैया, मुझे अपने घर जाना है। मुझे देर हो रही है, रास्ता छोड़ो मेरा। "

बिल्ला," अरे भैया ! तुम तो बुरा मान गए हो। अगर समझदार हो तो साबित करो। "

चंदन," जाने दो मेरे बाप, मैं बेवकूफ ही अच्छा हूं। "

कालिया," हां भाई, जाने दो इसे। वैसे भी धौलपुर में बेवकूफ भरे पड़े हैं। "

चंदन (मन में)," ससुरे हमार गांव को गंवार समझते हैं। "

चंदन," हां, बोलो क्या बोल रहे हो तुम लोग ? बेवकूफ नजर आते हैं तुमको क्या हम ? "

बिल्ला," भैया, गुस्सा क्यों हो रहे हो ? तुम हमारे साथ एक खेल खेलो अगर जीते तो हम तुम्हें समझदार मान लेंगे और पैसे भी देंगे। और अगर तुम हारे तो तुम हमें एक बैल देकर जाओगे। "

चंदन," मैं समझदार ही हूं। मैं खेल में जीत जाऊंगा। "

बिल्ला," ठीक है तो फिर देखते हैं। "

बिल्ला ने 2 पर्चियों पर कुछ लिखा और दोनों पक्षों को अपने हाथों में पकड़ लिया। उधर चंदन भी जोश जोश में उन दोनों की बातों में आ गया।

बिल्ला," तुमको अब इन दोनों में से एक पर्ची चुननी है। एक में हम दोनों की हार लिखी हुई है और दूसरे में तुम्हारी हार लिखी हुई है, ठीक है। "

चंदन," थोड़ा मुश्किल है लेकिन भाग्य पर विश्वास रख सकता हूं। जय नल्लू बाबा की... सही पर्ची पर हाथ जाए। "

चंदन ने एक पर्ची चुनी। जब उसने पर्ची को खोला तो वह हैरान रह गया; क्योंकि उस पर लिखा था - मैं अपना एक बैल हार गया। 

चंदन," आई... क्या हुई गवा ? मैं तो गया काम से। "

बिल्ला," पढ़ो पढ़ो... पर्ची में क्या निकला है। "

चंदन," जी, मैं हार गया। "

बिल्ला," अच्छा... इसका मतलब अब एक बैल हमारा हुआ। "

चंदन," जी, लेकिन...। "

बिल्ला ने दूसरी पर्ची भी वहीं फेंक दी और कालिया के साथ एक बैल को लेकर चला गया। चंदन ने दोनों पर्चियां लेकर अपनी जेब में रख ली और उदास मन से एक बैल को लेकर घर की तरफ रवाना हुआ। थोड़ा सा आगे चलकर चंदन को दो व्यक्ति (गोपी और जग्गू) मिले।

गोपी," अरे ! क्या बात है, बहुत शांत और उदास जा रहे हो ? हम तुम्हारी कोई मदद कर सकते हैं क्या ? "

चंदन ने उन दोनों को अपने साथ हुई ठगी के बारे में विस्तार से बताया। "

गोपी," हमारे पास इसका इलाज है। सिर्फ बाबा ही इनकी मदद कर सकते हैं लेकिन एक मुश्किल है। "

चंदन," क्या..? बताओ भाई। मेरी मदद करो। "

गोपी," हमारे गांव में एक सिद्ध बाबा हैं जो तुम्हारा बैल वापस ला सकते हैं। लेकिन वह सिर्फ अपने गांव के लोगों की ही मदद करते हैं। "


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चंदन," क्या सच में..? "

गोपी," हां, उनके पास जादुई शक्तियां हैं। तुम्हारे एक बैल को देखकर दूसरा बैल लाकर दे देंगे। "

चंदन," तुम भले आदमी लगते हो, मेरी मदद करो। मेरा बैल ले जाओ और दूसरा बैल ले आओ भाई। "

गोपी," तुम भी भले आदमी लगते हो। हम तुम्हारी मदद करने को तैयार है। तुम यहीं रुकना, हम तुमसे यही मिलेंगे... ठीक है भाई। "

चंदन ने अपना बैल दे दिया। जिसके बाद गोपी और जग्गू बैल लेकर चले गए और सुबह तक भी नहीं आए। 

बिल्ला, कालिया गोपी और जग्गू चारों सगे भाई थे। चंदन ने बहुत इंतजार किया और फिर वह सुबह अपने घर चला गया।

उसे अकेला आया देखकर उसकी पत्नी सुंदरी ने पूछा।

सुंदरी," क्या हुआ ? आप खाली हाथ आए हैं। "

चंदन," हां, मैं वो...। "

सुंदरी," क्या हुआ ? आप क्या छुपा रहे हैं मुझसे ? "

चंदन," वो मैं... बैल तो लाया था लेकिन...। "

चंदन ने अपनी पत्नी को सारी बात बताई और वह दोनों पर्चियां भी दी। लेकिन जब सुंदरी ने दोनों पर्चियां खोलकर देखी तो दोनों पर्चियों में एक जैसा ही लिखा था। 

सुंदरी को सब समझ आ गया। 

सुंदरी," हां, वो चारों ठग थे। उन्होंने आपको लूट लिया है। "

चंदन," अब क्या कर सकते हैं ? "

सुंदरी," मेरे पास एक उपाय है। "

सुंदरी ने चंदन को एक उपाय बताया। 

चंदन," हां, यह ठीक है। मैं कल ऐसा ही करूंगा। "

अगले दिन चंदन ने चूड़ी बेचने वाले मनिहार का भेष बनाया और आसपास के गांव में उन ठगों को ढूंढने निकला।

चंदन को सुबह से दोपहर हो गई। तभी उसे एक घर के सामने दो बैल बंधे दिखे। 

चंदन," यह बैल तो मेरे हैं। यह घर जरूर उन ठगों का है। आज इनको नहीं छोडूंगा। मैं इनको सबक सिखाकर ही रहूंगा। "

चंदन उस घर के पास आवाज लगाने लगा।

बिल्ला बाहर आया।

बिल्ला," हमें चूड़ियों की कोई जरूरत नहीं है। भाई, आज घर में कोई नहीं है। चलो जाओ यहां से। "

चंदन," कोई नहीं भैया, आज तुम ही चूड़ी खरीद लो। "

बिल्ला," तुम को बोला है ना, घर में आज कोई भी महिला नहीं है। "

चंदन," अच्छा तो आज वो खेल ही खेल लीजिए जो कल रात को खेला था। "

चंदन अपने असली रूप में आ गया और उसने बिल्ला को बहुत पीटा। 

बिल्ला," अरे ! मत मारो भाई, गलती हो गई। अरे ! छोड़ दो। आई, आई...। "

बिल्ला अपनी टांगों से चल भी नहीं पा रहा था। चंदन ने मौके का फायदा उठाया और अपने बैल लेकर चला गया। बिल्ला के तीनों छोटे भाई (कालिया, गोपी और जग्गू) शाम को घर आए।

कालिया," भैया को क्या हुआ ? "

बिल्ला," वही व्यक्ति आया था जिसके हमने बैल ठगे थे। आई... बहुत मारा है उसने मुझे। वह अपने बैल भी ले गया। अब तुम जल्दी से जाकर वैद्य जी को बुलाओ। नहीं तो मैं तो गया। "

गोपी," आप फिक्र ना करें, भैया। ठीक है, हम भी जा रहे हैं। "

तीनों भाई वैद्य जी को लेने चले गए लेकिन गांव के चौराहे पर ही वैद्य जी मिल गए। "

वैद्य," कहां भागे जा रहे हो ? कुछ जल्दी में प्रतीत होते हो। "

कालिया," अरे ! हम किसी वैद्य जी को ढूंढ रहे हैं। हमारे भाई की पिटाई हुई है। उनकी हालत बहुत पतली है... मेरा मतलब खराब है। "

वैद्य," अरे ! राम-राम... किसने पिटाई की तुम्हारे भाई की, हां बताओ जरा ? हम हैं वैद्य। हम ठीक करेंगे आपके भाई को। "

गोपी," अरे ! तो वैद्य जी जल्दी चलिए। "

वैद्य," हां, चलो भाई। अभी तुम्हारे भाई की तकलीफ बढ़ाते हैं। 😂🤣

जग्गू," अरे ! क्या बोला आपने..? "

वैद्य," बेटा, मैंने कहा... अभी तुम्हारे भाई की तकलीफ भगाते हैं। वैद्य जो ठहरे... हमारा काम तकलीफ भगाने का ही तो है। "

जग्गू," ठीक है, जल्दी चलो अब। "

तीनो भाई वैद्य जी को घर ले आए। 

वैद्य," अरे ! किसका इलाज करना है ? मुझे यहां कोई दिख ही नहीं रहा। "

कालिया," वैद्य जी, नीचे देखो। यह हमारे भैया हैं और इनको चोट लगी है। "

वैद्य," बहुत गहरे घाव दे गया कमबख्त... लेकिन एक समस्या है, मेरी औषधि खत्म हो गई है। मैं तुम लोगों को औषधि बता देता हूं। पास के जंगल से ले आओ। "

वैद्य जी ने तीनों भाइयों को जंगल में औषधि लेने के लिए भेज दिया और फिर अपने असली रूप में आ गए। 

वैद्य जी का असली रूप देखकर बिल्ला के तो होश ही उड़ गए; क्योंकि चंदन ही भेष बदलकर आया था। 

बिल्ला," तू यहां फिर से आ गया। "

चंदन," हां, शायद अभी कुछ और हिसाब बाकी है। "

चंदन ने फिर से एक डंडा उठाया और बिल्ला को पीटना शुरू कर दिया और उसके भाइयों के आने से पहले ही वहां से भाग गया। जब बिल्ला के तीनों भाई वापस आए तो बिल्ला ने उनको सारा हाल सुनाया। 

बिल्ला," कमीने ने मार मार कर भरता बना दिया। उसे छोड़ना मत। "

जग्गू," बस बहुत हो गया। अब हम उस आदमी को जिंदा नहीं छोड़ेंगे। "

गोपी," लेकिन हम उसे कैसे ढूंढ लेंगे ? "

जग्गू," बहुत आसान है। उसने अपने घर के बाहर बैल जरूर बांधे होंगे। अब चलो, उसको वहीं पर पीटते हैं। "

कालिया, गोपी और जग्गू तीनों अपने भाई का बदला चंदन से लेने के लिए उसके गांव पहुंच गए और चंदन का घर ढूंढने लगे। तभी उन्हें दिखा की एक बड़े से घर के बाहर दो बैल बंधे हैं। 

गोपी," दुश्मन मिल गया। उसने अपने बैल यहां बांधे हैं। जरूर वो इस घर के अंदर ही होगा। "

कालिया," ध्यान रहे... उसको बहुत पीटना है। उसको याद रहे कि किससे पंगा लिया था ? "

तीनो भाई अंदर गए लेकिन वो घर एक पुलिस वाले का था। पुलिस वाले ने तीनों को बहुत पीटा। तीनों वहां से जान बचाकर किसी तरह भाग गए। 

पुलिस वाले के घर के बाहर चंदन भी खड़ा था। 

चंदन," मुझे पता था कि तुम मुझे ढूंढते हुए जरूर आओगे इसलिए मैंने अपने बैल पुलिस वाले के घर के सामने बांध दिए थे। "

कालिया," हमें माफ कर दीजिए। हम आज के बाद किसी को नहीं ठगेंगे। "

गोपी," तुम तो सच में अकलमंद हो। हमने तो सोचा था कि तुम्हें बहुत अच्छा बुद्धू बनाया लेकिन तुमने हमें अच्छा सबक सिखाया है। "


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चंदन," मेहनत से काम करो जिससे तुम्हारे साथ-साथ दूसरों की जिंदगी भी आसान हो जाए। अगर किसी को ठगोगे तो तुम्हें मेरे जैसा कब कोई मिल जाए, क्या पता ? चलो जी, अब मैं चलता हूं...राम राम। "

चंदन अपने बैल लेकर चला गया और ठगों को पुलिस वालों ने पकड़ लिया और कुछ महीनों की कड़ी सजा के लिए कारागार में डाल दिया।


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चालाक सेठ | Chalak Seth | Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories

चालाक सेठ | Chalak Seth | Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories


कहानियां हमारी जीवन में एक दर्पण का कार्य करती है। यह हमेशा किसी पाठक के लिए आनंदित माहौल पैदा करने के साथ-साथ, उसे कुछ नया भी सिखाती हैं। अगर आप Hindi Stories, Moral Stories या Bedtime Stories पढ़ने के शौकीन हैं तो आज मैं आपके साथ एक नई कहानी साझा करने जा रहा हूं। इस कहानी का नाम है - चालाक सेठ। यह एक Moral Story है, तो कहानी में हमारे साथ अंत तक जुड़े रहें।

चालाक सेठ | Chalak Seth | Hindi Kahani | Moral Stories | Hindi Stories | Bedtime Stories

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 चालाक सेठ 


चमनपुर नाम के एक छोटे से गांव में सोनू नाम का एक गरीब लकड़हारा रहता था। वह रोज सुबह जंगल में लकड़ी काटने के लिए जाया करता था। 

एक दिन... 
सोनू," अरे भाई ! आज तो जंगल की सारी लकड़ियों को काट ही दूंगा, हां। इन्हें बेचकर जो भी पैसे आएंगे, उर्मिला को उनसे एक ताजा मछली लाकर दूंगा। बेचारी कब से बोल रही है ? खुश हो जाएगी, हां। "

सोनू की इस आस में कि ज्यादा लकड़ी काटकर ज्यादा पैसे कमा लूंगा, लकड़ी काटते काटते शाम हो जाती है। 

तभी सोनू के पास एक सेठ भागते हुए आता है जिसके हाथ में एक धन की पोटली होती है। 

सेठ," अरे भाई ! मुझे जल्दी से कहीं छुपा दो, मेरे पीछे कुछ लुटेरे डाकू पड़े हैं... जल्दी करो। "

सोनू," सेठ जी, आप चिंता मत कीजिए। जल्दी से उस बड़े पेड़ के पीछे छुप जाइए। "

सेठ पेड़ के पीछे छुप जाता है। तभी वहां चार लुटेरे डाकू आ जाते हैं। 

डाकुओं का सरदार," क्यों रे ! क्या तूने यहां किसी सेठ को भागते हुए देखा है ? बता हमें। "

सोनू," नहीं-नहीं डाकू महाराज, मैंने तो किसी भी सेठ को यहां से भागते हुए नहीं देखा। "

तभी एक डाकू जो तोतला होता है। 

तोतला डाकू," अले लकड़हारे ! तुम तो थत बोल लए हो ना ? उस थेत के हाथों में एत दन की तोतली भी थी। अगर तूने हमें धूत बोला तो तुम्हारी थैर नहीं। समझे तुम..? हम लुतेरे दातू हैं...लुतेरे दातू हैं।

सोनू," डाकू भाई, जरा धीरे-धीरे बोलोगे तो समझ में आ जाएगा । मुंह से सुपारी थूक दो ना। "

तोतला डाकू," साले, मेला मदाक बनाता है। ए ! तू लुक, मैं अभी बताता हूं तेले को। जल्दी से उस्ताद को थेत का पता बता। "

सोनू," नहीं नहीं डाकू महाराज, मैं सच बोल रहा हूं। मैंने यहां से किसी भी सेठ को भागते हुए नहीं देखा है जिनके हाथों में धन की पोटली हो। लगता है आप जिस सेठ की बात कर रहे हैं वो किसी और दिशा में चला गया होगा। "

तोतला डाकू," उत्ताद, लगता है ये लतलहारा ठीक बोल ला है। वो थेत दलूल दूतली दिथा में दया होगा। तलो यहां थे...। "

सरदार," अच्छा ठीक है, चलो फिर यहां से। वह सेठ बचकर जाना नहीं चाहिए। हमें उसकी धन की पोटली चाहिए। "

जिसके बाद सभी डाकू वहां से चले जाते हैं। तभी सेठ पेड़ के पीछे से निकल कर आता है। 

सेठ," तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद भाई ! आज तो तुमने मुझे बाल-बाल बचा लिया। "

सोनू," लेकिन सेठ जी आप उन लुटेरों से इस तरह भाग क्यों रहे थे और वह डाकू आपके ही पीछे क्यों पड़े हैं ? "

सेठ," अरे भाई ! मैं दूसरे गांव का एक सुनार हूं। आज मेरी दुकान पर कुछ लुटेरे डाकुओं ने मेरा धन लूटने के लिए हमला कर दिया। 
बड़ी मुश्किल से मैं अपनी जान बचाकर भागा और जितना भी धन मेरे पास था, सब इस पोटली में बांध लिया और भागते भागते जंगल में आ गया। 

लुटेरे डाकू भी मेरा पीछा करते-करते यहां तक आ गए। वो मुझसे मेरे धन की पोटली छीनना चाहते हैं। "

सोनू," सेठ जी, वो डाकू आप को ही क्यों ढूंढ रहे हैं ? यहां आपका ज्यादा समय तक रुकना ठीक नहीं होगा। आप मेरे साथ मेरे घर चलिए। "

जिसके बाद वह सेठ सोनू के साथ उसके घर जाता है। तभी सोनू की पत्नी उर्मिला कहती है। 

उर्मिला," जी, आ गए आप ? मैंने आपसे कहा था ना, मुझे आज मच्छी ही खानी है। और यह क्या..? आप किसे अपने साथ ले आए हैं जी ? "

तभी सोनू अपनी पत्नी को सारी बात बताता है। तभी सोनू की पत्नी सेठ के हाथों में धन की पोटली देती है और उसके मन में सेठ के धन को लेकर लालच आ जाता है। 

उर्मिला," अरे वाह ! इस सेठ की धन की पोटली में तो बहुत धन लगता है। अगर यह धन मेरे पास आ जाए तो कितना अच्छा होगा ना ? आय हाय ! मेरे तो मजे ही आ जाएंगे। "

उर्मिला," अरे सेठ जी ! आप चिंता मत कीजिए। आप यहां हमारे घर में रुक सकते हैं। लेकिन यहां अगर लुटेरे डाकू आ गए तो आपके इस धन की पोटली को तो वो लूटकर ले जाएंगे। 

आप अपनी धन की पोटली को मुझे दे दीजिए, मैं इसे संभालकर रख देती हूं। ना जाने कब यहां डाकू आ जाएं ? "

तभी सोनू अपनी पत्नी के मन के लालच को भांप लेता है। 


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सोनू," नहीं नहीं सेठ जी, आप एक काम कीजिए... मेरे घर में ही एक गड्ढा खोदकर उसमें ही यह धन की पोटली छुपा दीजिए। वो डाकू कभी नहीं जान पाएंगे, आपने अपने धन की पोटली कहां छुपाई है, हां ? "

सेठ," ठीक है भाई, अगर तुम कहते हो तो मैं अपनी इस धन की पोटली तुम्हारे घर की जमीन में गड्ढा खोदकर छुपा देता हूं। "

पोटली छुपाने के बाद...
सोनू," सेठ जी, अब आप आराम कीजिए। "

तभी सेठ की आंख लग जाती है और वह सो जाता है। सोमू जहां सेठ ने अपने धन की पोटली छुपाई थी, वहां खड़ा होकर धन की रखवाली करता है। 

सोनू," अगर सेठ की धन की पोटली डाकू ले गए तो..? सेठ के धन के साथ-साथ लकड़ी बेचकर साल भर की जमा पहुंची मेरी भी लूट ले जाएंगे। नहीं नहीं, मैं ऐसा नहीं होने दे सकता। "

इसके बाद सोनू एक पोटली में अपना धन वही जंगल में छुपा देता है जहां वह लकड़ियां काटा करता था। 

वहीं जमीन में गड्ढा खोदकर वह धन छुपा देता है और वापस अपने घर आ जाता है। थोड़ी देर बाद सोनू के घर पर चारों लुटेरे डाकू आ जाते हैं। 

डाकुओं का सरदार," अरे ओ लकड़हारे ! तूने हमें धोखा दिया। वह सेठ तेरे ही घर आया था। अब बता... वह कहां है ? अब हम तुझे नहीं छोड़ेंगे, हां। 

लुटेरे डाकुओं का सरदार नाम है मेरा... अच्छे-अच्छे कि टांय टांय फिस कर देता हूं और तू मुझसे ही होशियारी करने चला था। "

सोनू डाकू की यह बात सुनकर हैरान हो जाता है। अपने आसपास देखता है तो उसे कहीं भी सेठ नजर नहीं आता। 

सोनू (मन में)," सेठ जी कहां चले गए ? लगता है... वो सेठ जी भाग गए। अब ये लुटेरे डाकू मुझे नहीं छोड़ेंगे। "

तोतला डाकू," थरदार, लगता है ये ऐथे नहीं बताएगा, थेत कहां है ? दांव के लोगों ने थेत को इथके थाथ ही देखा था। चलो थरकार, इथे उथाकर अपने थाथ लिए तलो। "

सोनू," नहीं-नहीं डाकू महाराज, मुझे नहीं पता कि वो सेठ कहां है ? उसकी धन की पोटली कहां है ? मुझे नहीं पता सरकार। 

वह सेठ थोड़ी देर पहले यहीं तो था लेकिन अब मुझे नहीं पता, वह कहां गया ? डाकू महाराज, माफ कर दीजिए मुझे। "

तभी सोनू की पत्नी (उर्मिला) वहां आती है और डाकुओं के सरदार से कहती हैं।

उर्मिला," नहीं नहीं, छोड़ दीजिए इन्हें। यह मेरे पति हैं। इन्होंने कुछ नहीं किया। मैं आपको बताती हूं। आपको सेठ के धन की पोटली ही चाहिए ना ? 

धन की पोटली यहां मेरे घर में जमीन के नीचे गढ़ी दफन है। आप उसको खोदकर ले जाइए लेकिन मेरे पति को छोड़ दीजिए। "

तोतला डाकू," अच्छा तो थेत ने धन की पोतली यहां थुपाई है। उत्ताद, मैं बोलता हूं, दल्दी ते दमीन थोदकर निकाल दीजिए धन की पोतली। "

सरदार," हां, तुम लोग क्या देख रहे हो ? जल्दी से जमीन खोदो। "

तभी वो लुटेरे डाकू सोनू के घर में जमीन खोदना शुरू कर देता है लेकिन काफी देर तक उन्हें कोई भी धन की पोटली नहीं मिलती। 

सरदार," अरे ! यहां तो कुछ नहीं है। आखिर कहां गई धन की पोटली ? तुम दोनों मेरे साथ मजाक कर रहे हो। 

तुम दोनों उस सेठ का धन अकेले ही हड़पना चाहते हो। हम लुटेरे डाकू हैं। हमारे साथ होशियारी करते हो। "

तोतला डाकू," अले थरदार ! ये दोनों पति-पत्नी हमाले साथ मदाक के मूद में नजल आते हैं। इन्हें नहीं पता हम तोई मामूली दाकू नहीं है, हम लुटेले दाकू है। "

तोतला डाकू," देखो... तुम दोनों थीधे- थीधे बता दो, कहां थुपा लखा है थेत का घन, वलना तुम दोनों अपनी दान से हाथ धो बैथोगे। "

तभी वहां पर सेठ आ जाता है। सेठ को देखकर सोनू और उसकी पत्नी हैरान रह जाते हैं। 

तोतला डाकू," अच्छा हुआ थेत दो तुम यहां आ गए वलना हमाले उत्ताद तुम्हें तहीं ते भी धूंध नितालते। "

सेठ," डाकू महाराज, आप इन दोनों मासूम पति पत्नी को छोड़ दीजिए। उन्हें नहीं मालूम कि मैंने अपना धन कहां छुपाया है ? 

जब सोनू की आंख लग गई थी तो मैं खुद ही उठकर अपने धन की रखवाली करने लगा। उसी समय मैंने तुम्हें आता देख लिया इसलिए मैं अपने धन की पोटली उठाकर वहां से भाग गया। 

तुम चलो मेरे साथ डाकू महाराज, मैं आपको अपने धन की पोटली देता हूं लेकिन सोनू और उसकी पत्नी को छोड़ दो। "

इसके बाद सेठ और सोनू उन चारों डाकुओं के साथ उस जंगल में जाते हैं जहां सोनू लकड़ी काटा करता था। 

तोतला डाकू," थेत थत-थत बता, कहां थुपाया है अपना धन ? दल्दी बता, दिमाग की थोती मत कर बता रहा हूं। "

सेठ," डाकू महाराज, मैंने अपने धन की पोटली यहां जंगल में जमीन के नीचे छुपा दी थी। तुम मेरे धन की पोटली निकालकर ले जाओ। "

सोनू सेठ की यह बात सुनकर बहुत हैरान रह जाता है; क्योंकि यह तो वही जगह है जहां पर सोनू ने अपना धन छुपाया था।

सरदार," अच्छा... हमसे होशियारी करता है। हम लुटेरे डाकू है, हां। सेठ, अब देख हम तेरा सारा धन ले जाएंगे, हा हा हा...। "

तभी डाकू जंगल में जमीन खोदकर वह धन की पोटली निकालते हैं। सोनू यह देखकर हैरान रह जाता है; क्योंकि वह तो सोनू की ही धन की पोटली थी। 

सोनू (मन में)," हे भगवान ! यह तो मेरी ही वर्षों की मेहनत से जमा किया हुआ धन था लेकिन सेठ इसे अपना धन क्यों बता रहा है ? 

हे भगवान ! अब मैं क्या करूंगा ? इस सेठ ने तो मेरे साथ धोखा किया है। हाय हाय ! अब तो मेरे पास कुछ भी नहीं बचेगा। "

तोतला डाकू," अरे ! वाह वाह... हमें तो माल मिल दया। देखो थरकार, ये लहा थेत का धन। "

सरदार," हां, अब चलो यहां से। यह धन तो हमारे लिए काफी पर्याप्त है। आखिरकार हमने सेठ का धन लूट लिया, हा हा हा...। "

इसके बाद वो डाकू वहां से सेठ की धन की पोटली लेकर वहां से चले जाते हैं। 

सोनू," सेठ जी, आपने ऐसा क्यों किया ? आपने अपना धन ना देकर उन लुटेरे डाकुओं को मेरी मेहनत से जमा की हुई पोटली को ले जाने दिया और अपना काफी धन ना जाने कहां छुपा दिया ? यह आपने अच्छा नहीं किया सेठ जी। अब मैं क्या करूंगा ? "

सेठ," अरे अरे सोनू ! तुम दुखी मत हो। मैंने तुम्हारे साथ कोई अन्याय नहीं किया है। जब तुम यहां इस जंगल में अपना धन छुपाने आए थे, उसी वक्त मेरी आंख खुल गई और मैं तुम्हारा पीछा करता करता यहां आ गया था। 

मैंने सब देख लिया था। लेकिन जैसे ही मैं तुम्हारे घर वापस जा रहा था तो मैंने देखा कि वही लुटेरे डाकू गांव के कुछ लोगों से तुम्हारे घर का पता पूछ रहे थे। 

मैं जान गया था कि अब यह मुझे ढूंढते ढूंढते तुम्हारे घर ही आएंगे इसलिए डाकुओं के तुम्हारे घर पहुंचने से पहले अपना छुपाया हुआ धन तुम्हारे घर से निकालकर ले गया था। 

लेकिन मुझे मालूम था, बिना धन लिए लुटेरे डाकू वापस नहीं जाएंगे इसलिए मैंने अपने घन की बजाय तुम्हारे धन का रास्ता उन्हें बता दिया; क्योंकि मेरा धन तुम्हारे जमा किए गए धन से कई गुना अधिक था। 

तभी सेठ अपने कुर्ते की जेब से धन की पोटली निकालता है और पोटली में से काफी सारे सोने - चांदी के जेवर सोनू को देता है। 

सेठ," यह लो सोनू, तुम्हारा जो धन लुटेरे डाकू लेकर गए हैं, यह उनसे कई गुना ज्यादा है। अब तुम अच्छे से अपनी जिंदगी बिता सकते हो। "

यह देखकर सोनू बहुत खुश हो जाता है। 


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सोनू," सेठ जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपके बारे में कितना गलत सोचा ? मुझे लगा आपने उन लुटेरे डाकुओं को अपना धन ना देकर मेरे धन का रास्ता उन्हें बता दिया, तो आपने मेरे साथ अन्याय किया लेकिन आपने तो मुझे यह सोने चांदी के जेवर देखकर मेरी नैया ही पार लगा दी है, हां। 

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सेठ जी ! आपने अपनी सूझबूझ से उन लुटेरे डाकुओं को अच्छा बेवकूफ बनाया है। "

इसके बाद सेठ अपने गांव लौट जाता है और सोनू अपनी पत्नी के साथ खुशी-खुशी रहने लगता है।


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